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Showing posts from February, 2017

आदर्शवाद

आदर्शवाद विचारवाद  या  आदर्शवाद  या  प्रत्ययवाद  (Idealism ; Ideal= विचार या प्रत्यय) उन विचारों और मान्यताओं की समेकित  विचारधारा  है जिनके अनुसार इस जगत की समस्त वस्तुएं  विचार  (Idea) या  चेतना  (Consciousness) की अभिव्यक्ति है। सृष्टि का सारतत्त्व  जड़ पदार्थ  (Matter) नहीं अपितु चेतना है। आदर्शवाद जड़ता या  भौतिकवाद  का विपरीत रूप प्रस्तुत करता है। [1]  यह आत्मिक-अभौतिक के प्राथमिक होने तथा भौतिक के द्वितीयक होने के सिद्धांत को अपना आधार बनाता है, जो उसे देश-काल में जगत की परिमितता और जगत की  ईश्वर  द्वारा रचना के विषय में  धर्म  के  जड़सूत्रों  के निकट पहुँचाता है। आदर्शवाद चेतना को  प्रकृति  से अलग करके देखता है, जिसके फलस्वरूप वह मानव चेतना और संज्ञान की प्रक्रिया को अनिवार्यतः रहस्यमय बनाता है और अक्सर  संशयवाद  तथा  अज्ञेयवाद  की तरफ बढ़ने लगता है। [2] प्रत्यय और आदर्श कुछ विचारकों के अनुसार मुनष्य और अन्य प्राणियों म...

प्रयोजनवाद

व्यावहारिकतावाद प्रयोजनवाद  या  फलानुमेयप्रामाण्यवाद  या  व्यवहारवाद अंगरेजी  के "प्रैगमैटिज़्म" (Pragmatism) का समानार्थवाची शब्द है और प्रैगमैटिज़्म शब्द  यूनानी भाषा  के 'Pragma' शब्द से बना है, जिसका अर्थ "क्रिया" या "कर्म" होता है। तदनुसार "फलानुमेयप्रामाण्यवाद" एक ऐसी विचारधारा है जो ज्ञान के सभी क्षेत्रों में उसके क्रियात्मक प्रभाव या फल को एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान देती है। इसके अनुसार हमारी सभी वस्तुविषयक धारणाएँ उनके संभव व्यावहारिक परिणामों की ही धारणाएँ होती हैं। अत: किसी भी बात या विचार को सही सही समझने के लिए उसके व्यावहारिक परिणामों की परीक्षा करना आवश्यक है। प्रयोजनवाद एक नवीनतम् दार्शनिक विचारधारा है। वर्तमान युग में  दर्शन  एवं  शिक्षा  के विभिन्न विचारधाराओं में इस विचारधारा को सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है। यथार्थवाद ही एक ऐसी विचारधारा है जिसका बीजारोपण मानव-मस्तिष्क में अति प्राचीन काल में ही हो गया था। यथार्थवाद किसी एक सुगठित दार्शनिक विचारधारा का नाम न होकर उन सभी विचारों का प्रतिनि...