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Showing posts from June, 2023

भूकम्प एवं वैदिक ज्योतिष - एक समीक्षा

भूकम्प एवं वैदिक ज्योतिष - एक समीक्षा... वैदिक ज्योतिष के प्राचीन संहिताकारोंने अपने ग्रन्थोंमें 'मेदिनी ज्योतिष' से सम्बन्धित विषयोंपर अनेकानेक सूत्र एवं सिद्धान्तोंका सारगर्भित विवेचन किया है। इन ऋषि- मनीषियोंमें गर्ग, नारद एवं #वराहमिहिर ने अपनी संहिताओं क्रमशः #गर्गसंहिता, नारदीय संहिता एवं बृहत्संहिता में #भूकम्प के परिप्रेक्ष्यमें निम्न महत्त्वपूर्ण विषयोंपर विस्तृत विवेचन किया है-  (१) नक्षत्रमण्डल,  (२) दिग्दाह-लक्षण,  (३) उल्का लक्षण एवं  (४) परिवेष लक्षण। आचार्य गर्गकी संहितामें वर्णित तिथियोंका भूकम्पसे निश्चित सम्बन्ध वैज्ञानिक शोधमें सटीक एवं महत्त्वपूर्ण पूर्वसूचकके रूपमें प्रतिस्थापित हुआ है। प्राकृतिक आपदाओंमें सबसे भयावह एवं व्यापक क्षतिकारक है भूकम्पकी त्रासदी । भारतवर्षमें सम्भावित भूकम्पक्षेत्रके रूपमें एक बड़ा भाग पूर्वनिश्चित किया गया है। भूकम्पसे सम्बन्धित वैदिक #ज्योतिषीय सूत्र एवं सिद्धान्त वर्तमान वैज्ञानिक शोधोंमें पूर्णरूपेण प्रतिष्ठित हुए हैं। हालहीमें किये गये एक विस्तृत वैज्ञानिक शोधमें मद्रास विश्वविद्यालयके भूगर्भशास्त्रियोंने पाया है...

हाथ में समस्त पौरुष विद्यमान है। वेद वचन है और ज्योतिषशास्त्र।

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भाग्य भवन जाँघ है भाग्य विधाता हाथ है। जांघ तक हाथ की पहुँच है। जाँच पर्यन्त जिसका हाथ पहुँचता है, वह अतिमानव महाभाग्यशाली है। ऐसा पुरुष आजानुभुज कहलाता है। मनुष्य जन्म पाना ही भाग्यवान् होना है। सम्पूर्ण जाँघ को ढकने वाला हाथ चक्रवर्ती सम्राट वा वीतरागयोगी का होता है। भाग्य भवन का निर्माण इन हाथों से होता है। इन हाथों को मेरा नमस्कार । दानी हाथों को मेरा बारम्बार नमस्कार ! हाथ में समस्त पौरुष विद्यमान है। वेद वचन है ... "हस्ते दधानो नृम्णा विश्वान्यमे देवान् धाद, गुहा निषीदन् ।  विदन्तीमत्र नरो धियंधा हृदा यत् तष्टान् मन्त्री अशंसन् ॥"  ( ऋग्वेद १ । ६७ । २) हस्ते = हाथ में। दधानः = धारयन् = धारण करता हुआ। नृम्णा पौरुषाणि पौरुषों/बलों को। विश्वानि =सर्वाणि सबको। अमे= गति में, सेवा में, सम्मान में, शब्द (ज्ञान) में, स्वाद में, भोजन 1 में, रोग में, व्याधि में, कष्ट में, भय में। (अम् अमति भ्वा .पर. जाना, सेवा करना, सम्मान करना, शब्द करना, खाना, टूट पड़ना, आक्रमण करना, रोग से कष्ट होना, व्याधिमस्त होना, रोगी होना, भयभीत होना, कच्चा होना, अपक्व होना + घञ् = अम्)। देवान् = देवताओं ...

काल पुरुष की कुण्डली में नवम स्थान

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काल पुरुष की कुण्डली में नवम स्थान धनु आक्रान्त होता है। धनुपति गुरु ज्ञान है। धनु के ठीक सामने मिथुन है। इसका स्वामी बुध है। बुध बुद्धि है। संख्या ९ से ६ की उत्पत्ति होती है।  【९ +९= १८,  १८ - १२ = ६ ।】 संख्या ६ का स्वामी बुध है। ६= कन्या = बुध की उच्च एवं मूल त्रिकोण राशि बुध तो बुद्धि है ही। बुध की उच्च राशि कन्या उच्च वा उत्कृष्ट बुद्धि की द्योतक है। लग्न में पड़ने पर जातक बुद्धिमान होता है। संख्या ३ से १२ की उत्पत्ति होती है। ३ +९= १२ । १२ मीन राशि है। इसका स्वामी भी गुरु है । ३, ६, ९, १२ द्विस्वभाव राशियाँ हैं। अतः मिथुन एवं कन्या के स्वामी बुध से उद्भूत बुद्धि तथा गुरु से प्रजात ज्ञान- दोनों द्विस्वभाव हुए। यही कारण है कि हर जातक की बुद्धि द्विस्वभाव होती है तथा ज्ञान भी द्विस्वभाव होता है। इससे बुद्धि में द्वन्द्व पैदा होता है तथा ज्ञान में संदेह बुद्धि का स्थिर होना द्वन्द्व का नाश है। संदेह का समाप्त होना ब्रह्मज्ञान है। स्थिरबुद्धि जातक ब्रह्मज्ञानी होता है। ब्रह्मज्ञानी की बुद्धि स्थिर होती है। स्थिरबुद्धि ब्रह्मवेत्ता को मैं प्रणाम करता हूँ। ज्योतिष का सामान्य सिद...

शरीर है, लग्न

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एक कहावत है-‘पहला सुख निरोगी काया'। शरीर का निरोग रहना मुख्य सुख है। शरीर है, लग्न। लग्न का कारक है, सूर्य । अतः शरीर को रोगयुक्त व रोगमुक्त करना सूर्य सापेक्ष है। रोग शरीर का धर्म है। सबको रोगी होना पड़ता है। इससे बचाव का एक अमोद्य मार्ग है। यह मार्ग श्रुति पतिपाद्य/वैदिक है। इसका अवलम्बन करने वाले के सम्मुख रोग अपनी पीठ दिखाता है। तीन रोग हैं-  १. दैहिक- इसका स्थान प्रथम भाव है। २. भौतिक- इसका संबंध पञ्चम भाव से है।  ३. दैविक यह नवम भाव में होता है।  प्रथम पञ्चम, नवम में परस्पर मैत्री संबंध होता है।  अतः तीनों भाग्यस्थान हैं।  १ मंगल, ५ सूर्य, ९ गुरु.  २ शुक्र, ६ बुध, १० शनि  ३ बुध, ७ शुक्र, ११ शनि -   ४. चंद्र, ८ भौम, १२ गुरु. उपरोक्त चारों परस्पर नैसर्गिक मित्र हैं।  त्रिकोण राशियाँ स्वभावतः मित्र हैं। ये तीनों भाग्य कारक हैं। नवम में जो राशि होती है, उससे पञ्चम एवं नवम अर्थात् लग्न एवं पञ्चम की राशि उसकी मित्र होती है। यही कारण है कि कोई न कोई रोग जातक को रहेगा ही। सभी रोगों के देवता हैं। इन देवता...

जातक के भाग्य का स्वरूप द्विविध

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जातक के भाग्य का स्वरूप द्विविध है। रेखागणितीय दृष्टि से यह त्रिकोणीय एवं चतुष्कोणीय है। भाग्यस्थान नवम है। नवम से नवम स्थान पञ्चम है। इसलिये यह पश्चम स्थान भाग्य का भाग्य हुआ। पञ्चम स्थान से नवम स्थान लग्न है। इसलिये यह लग्न पञ्चम का भाग्य हुआ। इससे स्पष्ट हो जाता है...  १. भाग्य = नवम स्थान ।  २. भाग्य का भाग्य पश्चम स्थान ।  ३. भाग्य के भाग्य का भाग्य लग्न व प्रथम स्थान ।  प्रकारान्तरतः हम कह सकते हैं... १. नवम स्थान = भाग्य ।  २. पञ्चम स्थान = भाग्य का बीज ।  ३. लग्न स्थान = भाग्य के बीज का बीज ।  इस प्रकार नवम स्थान स्थूल भाग्य है जबकि पञ्चम स्थान सूक्ष्म तथा प्रथम स्थान सूक्ष्मतर भाग्य है। जातकों का सूक्ष्मतम भाग्य ज्योतिष के फलित ज्ञान से परे है। इसे कोई नहीं बता सकता। अतः यह अनिर्वचनीय है। इसलिये यह परमात्मा है। इस वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि नवम से महत्वपूर्ण पञ्चम है और पञ्चम से अधिक महत्वपूर्ण प्रथम स्थान है। यही कारण है कि लग्न को वरीयता दी जाती है। हर कार्य में लग्न शुद्धि पर ध्यान दिया जाता है। लग्न ठीक नहीं तो कुछ भी ठीक नहीं। प्रथम...

दशम का व्यय स्थान भाग्य है

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दशम का व्यय स्थान भाग्य है। अथवा, भाग्यरूपी बीज से जो वृक्ष तैयार होता है, वह कर्म है। प्रकारान्तर से कर्मवृक्ष का बीज भाग्य है। इस बीज को प्रारब्ध कहा गया है। तीन प्रकार के बीज होते हैं-  १. वृक्ष से लगा हुआ अपक्व बीज (क्रियमाण कर्म) ।  २. वृक्ष से अलग हुआ सुपक्व बीज जो कि बोने के लिये रखा हुआ है। (सञ्चित कर्म ) ।  ३. क्षेत्र में बोया गया बीज जो कि अंकुरित होकर विस्तार प्राप्त कर रहा है। (प्रारब्ध कर्म) ।  इससे स्पष्ट है-कर्म ही भाग्य है। जो कर्म किया जा रहा है, पूरा नहीं हो पाया है, क्रियमाण कर्म है। जो कर्म किया जा चुका है, पर फलीभूत नहीं हो रहा है, सञ्चित कर्म है। यही सञ्चित कर्म जब फल देने लगता है तो प्रारब्ध कर्म कहलाता है। यह दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि यह पूर्वकाल का कृतकर्म है। इसलिये इसे अदृष्ट कहते हैं। इसी का नाम भाग्य वा दैव है। यह कर्म के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। दशम भाव में यह बोया जाता, बढ़ता और फैलता है। वहीं पकता पूर्ण होता है। पूर्ण होकर वही नवम भाव में आकर सचित होता है। कालान्तर में यही परिणामशील होकर देव नाम से जाना जाता है। दशम का कर्म जैसे ही न...

विष्णु के अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता नहीं

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विष्णु के अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता नहीं है। इस अद्वितीय विष्णु की गन्ध से सुवासित बुद्धि से मैं श्री महाराज जी को प्रणाम करता हूँ। विष्णु का नाम सम्पर है। इसलिये संसार बुद्धि से विष्णु का चिन्तन करता हूँ। संसार क्या है ? कैसा है ? कहाँ है ? कब है ? संसार संबंधी इन चार प्रश्नों का उत्तर है, किन्तु संसार क्यों है ? इसका उत्तर नहीं है। संसार है, यह सत्य है। संसार की सत्ता है, इसलिये इसका नाम भूः है। भुवे नमः। जो व्यक्ति है, वही संसार है। जैसा व्यक्ति है, वैसा संसार है। जहाँ व्यक्ति है, वहीं संसार है। जब तक व्यक्ति है, तब तक संसार है। दो संसार हैं-भीदर का संसार, बाहर का संसार दोनों सत्य हैं। जितने व्यक्ति है, उतने संसार है। यह भी सत्य है। संसार में १४ भुवन हैं। व्यक्ति के भीतर (देह में) १४ भुवन हैं। इन १४ भुवनों को करण कहते हैं। एक कारण ही १४ करणों के रूप में व्यक्त हो रहा है। इनमें ४ अन्तःकरण एवं १० बहिकरण हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार- ये चार अन्तःकरण है। १. मन = संकल्प विकल्प करने वालो वृत्ति ।  २. बुद्धि = निर्णय करने वाली शक्ति ।  ३. चित्त = चिन्तन / वैचारिक क्षमता ।  ४....

यात्रा-मुहूर्त तथा प्रस्थान- विचार

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यात्रा-मुहूर्त तथा प्रस्थान- विचार... यात्रा - मुहूर्त के लिये दिशाशूल, नक्षत्रशूल, समयशूल, भद्रा, योगिनी, चन्द्रमा, शुभ तिथि, नक्षत्र इत्यादि का विचार किया जाता है। शुभ तिथि - भद्रादि दोषरहित २, ३, ५, ७, १०, ११, १३ तथा कृष्ण पक्षकी प्रतिपदा।। शुभ नक्षत्र- अश्विनी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती। मध्यम नक्षत्र रोहिणी, तीनों उत्तरा, तीनों पूर्वा, ज्येष्ठा, शतभिषा ।  दिशाशूल " सोम शनीचर पूरव ने चालू।  मंगल बुध उत्तर दिशि कालू ।।  रवि शुक्र जो पश्चिम जाय।  हानि होय पथ सुख नहिं पाय॥  बीफै दक्खिन करै पयाना।  फिर नहिं समझे ताको आना ।।" पूरव, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण- चारों दिशाओंको सब जानते हैं, लेकिन इनके बीचकी अन्य चार दिशाएँ सबको स्मरण नहीं रहतीं। अतः आठों दिशाओं तथा उनके नक्षत्र- शूल, दिशाशूल और योगिनी-वास तिथियोंको सरलतापूर्वक तत्काल जान लेनेके लिये ऊपर चक्र दिया गया है। इसमें प्रत्येक दिशाके नीचे पहले नक्षत्रका नाम है, फिर वार तथा वारोंके अन्तमें वे तिथियाँ दी हुई हैं, जिन तिथियोंको उस दिशामें योगिनीका वास होता है, उन तिथियोंको उस दिशामें...

श्रीमद्भागवत पञ्चमस्कन्ध अध्याय २० का संबंध सूर्य

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श्रीमद्भागवत पञ्चमस्कन्ध अध्याय २० का संबंध सूर्य से है। द्युलोक तथा भूलोक के बीच की संधि का नाम अन्तरिक्ष है-'अन्तरिक्षं तदुभयसंधितम् ।' इस संधि के मध्यभाग में स्थित भगवान् सूर्य तीनों लोकों को तपाते और प्रकाशित करते हैं...  'यन्मध्यगतो भगवांस्तपताम्पतिस्तपन आतपेन त्रिलोकी प्रतपत्यवभासयत्यात्मभासा ।'  वे भगवान् सूर्य उत्तरायण, दक्षिणायन, विषुवत् नाम वाली क्रमशः मन्द, शीघ्र, सम गतियों से चलते हुए मकरादि राशियों में ऊंचे, नीचे, सम स्थानों में क्रमपूर्वक जा कर दिन को बड़ा, छोटा, समान करते रहते ... "स एष उदगयन दक्षिणायन वैषुवत संज्ञाति मान्द्य शैघ्य समान अभिगतिष्टि आरोहरावरोहण समान स्थानेषु यथासवनमभिपद्यमानो मकरादि राशिष्वहोरात्राणि दीर्घ ह्रस्व समाननानि विद्यते।" उत्तरायण का सूर्य तपन कारक है।  दक्षिणायन का सूर्य शीतकारक है। जब सूर्य भगवान् मेष या तुला राशि पर आते हैं, तब दिन एवं रात समान होते हैं...  "यदा मेषतुलयोर्वर्वते तदाहोरात्राणि समानानि भवन्ति।"  जब वृषभादि पांच राशियों में चलते हैं तब प्रतिमास रात्रियों में एक-एक घटी की कमी होती जाती है तथा उसी...