श्रीमद्भागवत पञ्चमस्कन्ध अध्याय २० का संबंध सूर्य

श्रीमद्भागवत पञ्चमस्कन्ध अध्याय २० का संबंध सूर्य से है। द्युलोक तथा भूलोक के बीच की संधि का नाम अन्तरिक्ष है-'अन्तरिक्षं तदुभयसंधितम् ।' इस संधि के मध्यभाग में स्थित भगवान् सूर्य तीनों लोकों को तपाते और प्रकाशित करते हैं...

 'यन्मध्यगतो भगवांस्तपताम्पतिस्तपन आतपेन त्रिलोकी प्रतपत्यवभासयत्यात्मभासा ।'

 वे भगवान् सूर्य उत्तरायण, दक्षिणायन, विषुवत् नाम वाली क्रमशः मन्द, शीघ्र, सम गतियों से चलते हुए मकरादि राशियों में ऊंचे, नीचे, सम स्थानों में क्रमपूर्वक जा कर दिन को बड़ा, छोटा, समान करते रहते ...

"स एष उदगयन दक्षिणायन वैषुवत संज्ञाति मान्द्य शैघ्य समान अभिगतिष्टि आरोहरावरोहण समान स्थानेषु यथासवनमभिपद्यमानो मकरादि राशिष्वहोरात्राणि दीर्घ ह्रस्व समाननानि विद्यते।"

उत्तरायण का सूर्य तपन कारक है।

 दक्षिणायन का सूर्य शीतकारक है।

जब सूर्य भगवान् मेष या तुला राशि पर आते हैं, तब दिन एवं रात समान होते हैं...

 "यदा मेषतुलयोर्वर्वते तदाहोरात्राणि समानानि भवन्ति।" 

जब वृषभादि पांच राशियों में चलते हैं तब प्रतिमास रात्रियों में एक-एक घटी की कमी होती जाती है तथा उसी अनुपात में दिन बढ़ते जाते हैं ...

'यदा वृषभादिषु पञ्चसु च राशिषु चरति सहान्येव वर्धने हसति च मासि मास्येकैका घटिका रात्रिषु।'

जब वृश्चिकादि पाँच राशियों भगवान् सूर्य चलते हैं तब दिन और रात्रियों में इसके विपरीत (रात्रियों में एक-एक घटी की वृद्धि तथा दिनों में एक-एक घटी का ह्रास) परिवर्तन होता है...

'यदा वृश्चिकादिषु पञ्चसु वर्तते तदाहोरात्राणि विपर्याणि भवन्ति।' 

इस प्रकार दक्षिणायण आरंभ होते तक दिन बढ़ते रहते हैं तथा उत्तरायण लगने तक रात्रियाँ बढ़ती रहती हैं...

 'यावद्दक्षिणायन महानि वर्धन्ते यावदुदगयन रात्रयः ।' 

सूर्य जिस मार्ग पर चलता हुआ प्रतीत होता है उसे राशि चक्र / नक्षत्र वीथी कहते हैं। इसमें २७ नक्षत्रों की २७ संधियों होती है अथवा, १२ राशियों की १२ संधियों होती है। इसमें नक्षत्रों एवं राशियों की ३ गण्डमूल संधियां होती है। इस संधियों को गाँठ कहते हैं। दो खण्डों का जोड़ गांठ होता है। इसे पर्व कहते हैं (पर्व = ग्रन्थिं)। पर्व युक्त होने से राशिपरिपथ को पर्वत भी कहते हैं। श्री मद् भागवत महापुराण में इस परिपथ को मानसोत्तर पर्वत कहते हैं।

 मानसोत्तर = मान + सोत्तर सोत्तर उत्तर उत्तर = उत् + तर ।

यह पथ ऊपर आकाश में होने से उतू (श्रेष्ठ) है। इस पथ को सूर्यादि पह पार कर करते हैं। अतः यह तर (पार्य) है। श्रेष्ठता एवं पार्यता से युक्त होने के कारण यह पथ सोत्तर है। इस पथ को एक निश्चित माप है। जिससे यह मान युक्त है। इस प्रकार इस का नाम मानसोत्तर पर्वत पड़ा है। सूर्य इस पथ पर एक अहोरात्र में चल लेता है। यह परिक्रमा मार्ग नौ करोड़ इक्यावन लाख योजन 

 'एवं नव कोटय एक पञ्चाशल्लक्षाणि योजनानां मानसोत्तरगिरि परिवर्तनस्योपदिशन्ति ।'

उस मेरु पर्वत के पूर्व की ओर इन्द्र की देवधानी, दक्षिण में यमराज की संयमनी, पश्चिम में वरुण की निम्लोचनी और उत्तर में चन्द्रमा की विभावरी नाम की पुरियों है...

 'तस्मिन्नन्द्री पुरी पूर्वस्मान्मेरोदेवधानी नाम दक्षिणतो याम्यां संयमनी नाम पश्चाद्वारुणी निम्लोचनी नाम उत्तरतः सीम्या विभावरी नाम।' 

इन पुरियों में मेरु के चारों ओर समय-समय पर सूर्योदय, मध्याह, सायंकाल एवं अर्धरात्रि होती रहती. है, इन्हीं के कारण सभी जीवों में प्रवृत्ति निवृत्ति है...

 'तापूदयमध्याहास्तमर्यानिशीथानीति भूतानां प्रवृत्तिनिवृत्तिनिमित्तानि समय विशेषेण मेरोश्चतुर्दिशम्।' 

एक अहोरात्र वा ६० घटी में सूर्य द्वारा तय की गयी दूरी = ९,५१००००० योजन।

इसलिये, १५ घटी में सूर्य द्वारा तय की गई दूरी 
=९,५१,००००० x १५/६० = ९,५१,००००० x१/४ = २,३७,७५००० योजन।

सूर्य देव जब इन्द्रपुरी से यमपुरी (पूर्वदिशा से दक्षिण दिशा) को चलते हैं, तब १५ घटी में सवा दो करोड़ (२,२५०००००) तथा साढ़े बारह लाख (१२५००००) योजन से अधिक दूरी चलते हैं

''यदा चैन्द्रयाः पुर्याः प्रचलते पञ्चदशघटिकाभिः याम्यां सपाद कोटिद्वयं (२,२५,००,०००) योजनानां सार्घद्वादश लक्षाणि (१२,५०,०००) साधिकानि (००,२५,०००) चोपयाति ।'

 २,२५००००० + १२,५०००० + कुछ अधिक (अर्थात् ००,२५०००) = २३७७५००० योजन।

 इस प्रकार इन्द्र पुरी से यमपुरी तक की दूरी = २ करोड़ ३७ लाख ७५ हजार योजन। इतनी ही दूरी यमपुरी से वरुण पुरी तक, वरुणपुरी से चन्द्रमा की पुरी तक तथा चन्द्रपुरी से इन्द्रपुरी तक की है।

 सूर्य का रथ (पिण्ड) एक मुहूर्त में ३४ लाख ८ सौ योजन चलता है। इस प्रकार यह वेदमय रथ चारों पुरियों का चक्कर लगाता रहता है...
' एवं मुहूर्तेन चतुखिंशल्लक्ष योजनान्यताधिकानि सौरो रथखपीयोऽसौ चतसृषु परिवर्तते पुरीष पुरीष।'

 【यहाँ १ मुहूर्त का मान २८ घटी से कुछ कम है =२७ .४०९८/४२५१ घटी】

 सूर्य की गति २ हजार दो सौ योजन प्रति क्षण है। ये ९ करोड़ ५१ लाख योजन के परिपथ को इसी गति से तय करते हैं 

'लक्षोत्तरं सार्धनवकोटि योजन परिमण्डलं भूवलयस्य क्षणेन सगव्यत्युत्तरं द्विसहस्रयोजनानि  स भुड़्क्ते।'

【 यहाँ १ क्षण = ११/१६००४ मुहूर्त अथवा १ मुहूर्त = १५४५. ९/११ क्षण】

 सूर्य का देदीप्यमानपिण्ड ३६ लाख योजन की परिधि वाला है ।

 'रथनीडस्तु षट्त्रिंशाल्लक्षयोजनायतः ।'

 सूर्यपिण्ड अरुणवर्ग का है। इसमें सप्तवर्णात्मक किरणें (हव/ अश्व/छन्द) है...

"यत्र हयाश्छन्दोनामान सप्तारुणयोजिता वहन्ति देवमादित्यम् ।' 

उदीयमान एवं अस्तमान सूर्य अरुण वर्ण का होता है- पुरस्तात् सवितुररुणः पश्वाच्च नियुक्तः सौत्ये कर्मणि किलास्ते।'

 सूर्य के आगे ६० हजार सूक्ष्माकार बालखिल्यादि अषि निरनतर स्वास्तिवाचन करते रहते हैं ..

'तथ बालखिल्या ऋषयोष्ठपर्वमात्राः षष्टिहाणि पुरतः सूर्य सूक्तवाकाय नियुक्ताः संस्तुवन्ति।' 

यहाँ ६० हजार बालखिल्यादि अषि = ६० की संख्या के अनन्त चक्र

【यथा,
 ६० वर्ष = १ चक्र।
६० दिन = १ ऋतु।
६० घटि = १ अहोरात्र।
६० अंश = १ अर।
६० कला = १ अंश।
६० विकला = १ कला।
६० प्रतिकला =१ विकला।
६० तत्प्रतिविकला = १ प्रतिविकला।
१ घटि = ६० पल।
१ पल = ६० विपल।
१ विपल =६० अनुपल।
१ घंटा = ६० मिनट।
१ मिनट = ६० सेकेण्ड।
१अंगुल = ६० व्यंगुल।】

 इस प्रकार प्रयोग में ६० के चक्र का कोई अन्त नहीं है। श्रीमद्भागवत में सूर्य सम्बन्धी जो कुछ ज्ञान है वह अत्यंत गूढ़ है सूक्ष्म है। अधिकारी भेद से यह प्रकट होता है। इसे समझना तथा समझाना दोनों कठिन है। इसके लिये मैं सूर्य से प्रार्थना करता हूँ ...

हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
 तत् त्वं पूषन् अपावृण सत्यधर्माय दृष्टये ॥ -( ईशावास्योपनिषद् १५ )

जिस भाव में सूर्य रहता है, वह भाव ऊर्ध्व मुख कहलाता है। जिस भाव में चन्द्रादि मह रहते हैं वह भाव तिर्यङ्मुख होता है। जिस भाव में कोई यह नहीं रहता, वह अधोमुख होता है। इससे स्पष्ट है-सूर्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है यह सुगन्धि (कीर्ति) का विस्तार करता है, यश और प्रतिष्ठा देता है, सम्मान बढ़ाता है, स्वाभिमान का द्योतन करता है।

दशमस्थ बलवान् सूर्य जातक को राजसत्ता से जोड़ता है।

 यह सूर्य न कभी अस्त होता है, न उदय होता है। उसको, जब छिपता है-ऐसा मानते हैं, तब वह दिन का अन्त करके अपने को दूसरी ओर दिखलाता है। इधर रात्रि करता है दूसरी ओर दिन। और जब उसको प्रातः काल उदय होता है ऐसा मानते हैं, तब वह रात का अन्त करके अपने को विरीत दिखलाता है। इधर दिन करता है और दूसरी ओर रात पर वह कभी छिपता या निकलता नहीं, वह कभी भी छिपता नहीं निकलता नहीं ।

 "स वा एष न कदाचनास्तमेति, नोदेति । 
तं यदस्तमेतीति मन्यन्तेऽन्हमेव तदन्तमित्वाथात्मानं विपर्यस्यते ॥ रात्रीमेवावस्तात् कुरुतेऽहः परस्ताम् ।। 
अथ यदेनं प्रातरुदेतीतिमन्यन्ते ।
 रात्रेरेव तदन्तमित्वाथात्मानं विपर्यस्यते ॥ हरेवावस्तात् कुरुते रात्रिं परस्तात् । 
स वा एष न कदाचन नि-प्रोचति न ह वै कदाचन नि-प्रोचति ॥" 
( ऐतरेय ब्राह्मण ३ । ४।६)

 इस महान् सत्य का साक्षात्कार ऋषियों ने किया था। आधुनिक वैज्ञानिक ऐतरेय ब्राह्मण के इस कथन को पढ़ कर हतप्रभ हो जाते हैं। हमें अपने पूर्वजों के इस ज्ञान पर गर्व है। मैं अपनी इस ज्ञान परम्परा के सामने श्रद्धा से सिर झुकाता हूँ।

सूर्य के गुण धर्म-उप स्वभाव, क्षत्रियवर्ग, प्रौढ़वय, चतुरस आकार, ऊर्ध्वदृष्टि, कटु स्वाद, मोटा व रक्तस्याम रंग, देव स्थान, ताम्र खनिज, सत्व गुण, अग्नि तत्व, पुंलिंग, पित्त प्रकृति, मध्यम शरीर, शहद समान नेत्र, अल्पकेश, श्रेष्ठ रूप, शुष्क- स्थिर मति, अस्थि धातु, दक्षिण पार्श्व, आशीर्षमुख प्रभाव, दक्षिण नेत्र, पित्तरोग, मध्याह्नकाल वली, दशमभाववली, पशुभूमि, वनस्थान, पर्वत वास, ग्रीष्म अतु, पूर्वदिशा, अयन (६ मास) समय, काष्ठ चतुष्पद व्रण, पाप ग्रह, शिव-देवता, राजा पदवी, आत्म कारक, पितास्वरूप, गौरिक दीप्ति, वैद्यक शास्त्र, व्याकरण विद्या, कीर्तिविजय-सम्मान-पद-प्रदाता ।
भीतर से दृढ़ एवं ऊंचा वृक्ष वृक्ष-मूल।

【मित्र ग्रह चन्द्र मंगल गुरु। 

सम ग्रह- बुध।

 शत्रु ग्रह शुक्र शनि राहु । 

एक पाद दृष्टि- ३ । १०, 

द्विपाद दृष्टि ५ ९, 

त्रिपाद दृष्टि- ४ । ८, 

चतुष्पाद (सम्पूर्ण) दृष्टि ७ । 

कारक भाव- १, ९, १०।

 हर्षस्थान- ९। 

भाग्योदय वर्ष २२। 

प्रभाव वर्ष ५० ।
 राशि चक्र परिभ्रमण वर्ष - १

 मध्यम राशि भ्रमण काल- १ मास।

 नक्षत्र चार समय- १३ दिन ।

 दीप्तांश-१५। 

दैनिक मध्यम गति- ५९', ८" ।

 शीघ्र गति - ६०, ४"।

 परमशीघ्र गति - ६१' । 

गोचर से निन्द्य स्थान- ४, ८, १२ । 

गोचर से पूज्य स्थान- १, २, ५, ७, ९ ।

 गोचर से शुद्ध स्थान- ३, ६, १०, ११ ।

 बलवत्तम भाव १० ।

 स्वगृह राशि-५ ।

अस्त राशि - ११ ।

 उच्च राशि एवं परमोच्चांश मेष १०°।

 नीच राशि एवं परमनीचाश- तुला १०°।

 मूलत्रिकोण राश्यंश सिंह २०° । 

मित्र राशि- १, ४, ८, ९, १२ । 

शत्रु राशि- २, ७, १०, ११ ।

 सम राशि- ३, ६ । 

स्वराशि-५ । 

चेष्टावली राशि- १०, ११, १२,९, २, ३ ।

 राशिचार फल- प्रवेशारंभ।】

सूर्य मेष राशि के दशवें अंश में परमोच्च होता है इस कथन के सन्दर्भ में मैं महाभारत के एक उपाख्यान की चर्चा करता हूँ।

विश्वकर्मा की पुत्री का नाम संज्ञा संज्ञा का विवाह सूर्य से हुआ। एक बार संज्ञा ने अपने पिता के घर जाने के लिये अपने पति सूर्य से अनुमति माँगी। सूर्य ने संज्ञा को नैहर जाने से मना कर दिया। संज्ञा ने एक युक्ति सोची। उसने अपने ही सदृश एक स्त्री बना कर उसे सूर्य के पास छोड़ कर स्वयं पितृ-गृह चली गई। इस स्त्री का नाम छाया था। छाया से सूर्य के द्वारा शनि की उत्पत्ति हुई। दीर्घ अन्तराल के बाद संज्ञा पुनः सूर्य के पास आई। सूर्य ने उसे अस्वीकार कर दिया। तत्पश्चात् वह अश्विनी (घोड़ी) का रूप धारण कर लोक लोकान्तरों में विचरण करने लगी। सूर्य को जब मालूम हुआ कि वह मेरी ही पत्नी है तो उन्हों ने उसे पुनः स्वीकार किया। अश्विनी से सूर्य के द्वारा यमल संताने उत्पन्न हुई। इसे अश्विनीकुमार कहते हैं। एक का नाम नासत्य और दूसरेका दस्र है। ये दोनों साथ-साथ रहते हैं तथा ये देवताओं के वैद्य (चिकित्सक) है।

जो अश्विनी नाम की अश्विनीकुमारी की जननी वा सूर्य की पत्नी है, वही है अश्विनी नक्षत्र यह राशि चक्र का प्रथम नक्षत्र है। इस नक्षत्र में सूर्य उच्च का होता है। उच्च से तात्पर्य है, उत्साह सम्पन्न, वीर्यवान्। लोक में यह देखा जाता है कि व्यक्ति (पुरुष) स्त्री को प्राप्त कर उत्साहित होता है, उसका वीर्य चलायमान हो जाता है, उसमें बल वृद्धि होती है। अश्विनी नक्षत्र केतु का है। केतु का अर्थ है-किरण। ‘सूर्य केतवः' अथर्व वेद । निष्कर्षतः अश्विनी नक्षत्र में आते ही सूर्य किरणवान् (अधिक उष्णता वाला) हो जाता है। अश्विनी नक्षत्र का मान १३° अंश २०' कला है। सूर्य अश्विनी के १० अंश में परमोच्च का है। अश्विनी का प्रथमपाद ३° २', द्वितीय पाद ६° ४०' तृतीय पाद १०° तथा चतुर्थपाद १३° २०' तक है। तीसरा पाद प्रौढ़ पाद है। (बाल युवा प्रौढ़ जरा पाद क्रमानुसार) प्रौढ़ता परिपक्वता का प्रतीक है। सूर्य का प्रौढ़ होना, ज्ञान का परिपाक है।

सूर्य की पत्नी संज्ञा है। इसका अर्थ है- सम्- ज्ञा अर्थात् सम्पूर्ण ज्ञान पर सूर्य का आधिपत्य है। सूर्य की पत्नी का नाम छाया है। छाया प्रकाश का अभाव। इसका तात्पर्य है- अज्ञान पर सूर्य का वर्चस्व है।

सूर्य की पत्नी है- अश्विनी। अश्व = किरण, गति। अश्विनी किरणायुक्त, गतिशील। इसका = अर्थ हुआ- प्रकाशयुक्त एवं गतिशील जितने भी पिण्ड हैं वे सब सूर्य द्वारा शासित पोषित हैं।

सूर्य+ संज्ञा के योग से यम यमी संतानें उत्पन्न हुई। यम अर्थात् यमन करने वा मारने वाला तथा यमी =कालिन्दी (यमुना) गहरा होने से यमुना का जल नीला है। इससे निष्कर्ष निकला सूर्य शासक है।  तथा जल देने वाला है (वर्षा कारक)।

सूर्य + छाया के योग से सावर्णि-शनि दो पुत्र एवं तपनी नाम की कन्या हुई। सावर्णि = एकरूपता, आठवें मन्वन्तर का स्वामी शनि शुष्क। तपनी उष्मा, धूप। इससे निष्कर्ष निकलता है-सूर्य सदा सर्वदा एकरूप है, स्थिर है, स्थिर स्वभाव वाला है। सूर्य सबको सुखा कर बलहीन कर देता है। यह इसका शनित्व है। सबको अपनी प्रखर किरणों से तपाता है पीड़ा देता है। सूर्य उष्मावान् है।

सूर्य + अश्विनी के योग से दो अश्विनी कुमार पैदा हुए। कथा है, अश्विनी कुमारों ने च्यवन मुनि की आँखें ठीक कर दी। ये देव वैद्य हैं। औषधि शास्त्र के ज्ञाता हैं। इन सबका भाव है- आँखों में जो ज्योति है वह सूर्य से है। सूर्य खोई हुई दृष्टि को पुनः वापस देता है। आयुर्वेद, शल्य शास्त्र, चिकित्सा विज्ञान, औषधि निर्माण का कारक सूर्य है। बलवान् सूर्य वाले जातक वैद्य, शल्यक, चिकित्सक, भिषक् होते हैं। अश्विनी कुमार रूपवान् हैं। इसलिये ऐसे जातक सुन्दर रूप पाते हैं।

कुन्ती ने कौमार्यावस्था में सूर्य का आवाहन किया। सूर्य ने उसे रतिदान दिया। उससे कर्ण नामक पैदा हुआ। कर्ण अमित पराक्रमी था। कर्ण दानवीर था। उस काल का वह अप्रतिम दानी था। इस पुत्र आख्यान का सार है-सूर्य प्रभावित कुण्डलियों वाले जातक संभोग प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं। धर्मानुकूल रति करते हैं। अत्यन्त पराक्रमी शूर वीर होते हैं। दान में इनकी समता करने वाला कोई नहीं होता। दृढ़ प्रतिज्ञ होते हैं। क्रूर कर्मा होते हैं। विश्वसनीय होते हैं। अंतिम साँस तक अपने मित्र का साथ देते हैं। अकृतघ्न होते हैं। स्पष्टवादी होते हैं। कुन्ती पुत्र कर्ण के चरित्र में जो कुछ है, वह सब सूर्य शासित कुण्डली वाले जातक में होता है।

सूर्य अध्यात्म विद्या और व्याकरण शास्त्र का कारक है। इस विषय में पौराणिक कथा है। हनुमान् जी के गुरु सूर्य हैं। सूर्य के सामने प्रस्थित होकर सूर्य के रथ की गति से चलते हुए मारुति नन्दन हनुमान् ने वेद-वेदांग, शास्त्र एवं उपनिषदों का अध्ययन किया। व्याकरण शास्त्र में विशेष योग्यता प्राप्त की। बाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमान् जी शुद्ध एवं परिमार्जित शास्त्रीय संस्कृत में बोलते थे। हनुमान् जी जैसा संस्कृत वक्ता त्रिलोक में कोई नहीं है।

सूर्य पुष्टिवर्धक है। हड्डी का कारक होने से शरीर को दृष्ट पुष्ट बनाता है। लग्न भाव का कारक होने से शरीर का यह प्रतीक है। जैसा सूर्य होगा वैसा शरीर होगा। 

सूर्य देवो ज्ञान का दाता है। आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिये सूर्य की उपासना की जाती है। अपनी दशान्तर्दशा वा गोचर में जब सूर्य अशुभ फल दे रहा हो तो उसकी शांति के लिये दान व्रत जप करना चाहिये।

 दानद्रव्य- माणिक, सोना, तांबा, गेहूँ, गुड़, घी, लाल कपड़ा, लाल फूल, मूंगा, केशर, लाल गऊ, लाल चन्दन, लाल कम्बल

 दान का समय- अरुणोदय सूर्योदय काल । 

दान का दिन रविवार वा रवि की होरा।

 जप मंत्र-सूर्याय नमः । 

समिधा-मदार। 

धारणा रत्न माणिक्य सोने की अंगूठी में रवि-पुण्ययोग में।

 उपरत्न- विद्रुम लाल तामड़ा मध्याह्न में।

 धारणार्थ जड़ी-बिल्वमूल। जड़ी धारण का फल रत्न के समान होता है। 

पुष्यार्क योग में धारण करने से पूर्व तत्संबंधी पूजनादि क्रिया सम्पन्न कर लेनी चाहिये। लालरंग के डोरे में बाँध कर पुरुष अपनी दाहिनी भुजा में पहने तथा स्त्री गले में सविधि धारण करने पर फल तत्काल से ही मिलना प्रारंभ हो जाता है।

एक मंत्र है...

 "तस्याम् सर्वा नक्षत्रा वशे चन्द्रमसा सह । "
 (अथर्व १३ १४ ।२८ |)

चन्द्रमा सहित सभी नक्षत्र सूर्य के वश में हैं। 

इसका अर्थ है-सूर्य द्युति पति है। सूर्य के अस्त होने पर ही चन्द्रमा एवं नक्षत्रादि पिण्ड दिखायी देते हैं, उदय होने पर अदृश्य हो जाते हैं। मन्त्र का भाव है-जिसकी कुण्डली में बलवान् सूर्य है, वह जातक शासित होना नहीं चाहता, शासक बनना चाहता है और होता भी है। वह जातक स्वानुशासित होता है। सूर्य सबका परोक्ष रक्षक है। सूर्य दैव है। कवि कहता है ...

"अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । 
जीवत्यनाथो विपिनेऽप्यरक्षितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे विनश्यति ॥"

 जिसका कोई रक्षक नहीं है, उसकी रक्षा सूर्य करता है। जो किसी के द्वारा रक्षित है, उसको सूर्य मार डालता है। जंगल में अनाथ जीवित रहता है, जबकि घर में रक्षा हेतु यत्नवान् मृत्यु को प्राप्त होता है। सूर्य अदृष्ट प्रेरक है। अदृष्ट = भाग्य। अदृष्ट का प्रेरक दैव दैव और भाग्य में यहीं अन्तर है। सूर्य देव बोधक है, शनि भाग्य कारक है। कर में सूर्य रेखा के अभाव में शनि (भाग्य) रेख फलीभूत नहीं होती। अदृष्ट प्रेरक होने से सूर्य को सविता कहते हैं...

 स एति सविता स्वर्दिवस्पृष्ठेऽव चाकशत् । ( अथर्व १३ ।४ ।१ )

सविता = षू प्रेरणे। 

स्वः = स्वृ उपताये। 

चकाशत् = चकास् दीप्तौ। 

अब = नीचे।

 दिवस्पृष्ठे = शिर पर ।

एति =आता है। 

सूर्य आत्मा है। आत्मा कर्माध्यक्ष है, कर्तानहीं। जीव कर्ता भोक्ता है। जीव स्वकर्मवश सुख दुःख पाता है। 'मैं करता हूँ'-ऐसा कहना उचित नहीं। कर्म ही कर्म को करा रहा है। पूर्वजन्मजन्मान्तरों के कर्म संस्कार मुझसे लिखवा रहे हैं।

तत्ववेत्ता कहताहै ...

"सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता
      परो ददादीति कुबुद्धिरेषा।।
 अहं करोमीति वृथामिमानः
              स्वकर्मसूत्रप्रथितो हि लोकः ।।"

 इसी बात को तुलसी दास दुहराते हैं...

 'नहि कोड है सुख दुःख कर दाता । निजकृत कर्म भोग सब भ्राता ॥" 
(राम चरितमानस )

मैंने इसी कर्मसूत्र की प्रेरणा से श्रीमद्भागवत गत सूर्य विज्ञान पर दृषि डाला श्री वेदव्यास की विशाल एवं सूक्ष्म बुद्धि का यह कौतुक है। यह सम्पूर्ण रूप से सब के लिये ग्राह्य नहीं है।

 "एहि सूर्य । सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते । 
अनुकम्पय मां देव पाहि पाहि दिवस्पते ॥"

 अब मैं द्वादशभाव गत सूर्य के फल का कश्यपोक्त उपकथन करता हूँ,...

प्रथम भावस्थ सूर्य ...

१. उच्च राशि में, तीव्री। 
२. उच्च नवांश में, दृढांग ।
 ३. शुभग्रह के नवांश में, बहु आशी।
 ४. नीच राशि में, रोगी ।
 ५. नीच राशि के नवांश में, लावण्यहीन । 
६. पाप ग्रह के नवांश में, अन्धा ।
 ७. मित्र की राशि में दीर्घ । 
८. मित्र राशि के नवांश में जटिल। 
९. वर्गोत्तम में अधिकांग । 
१०. शत्रु राशि में हीनांग । 
११. शत्रु राशि के नवांश में दीन। 
१२. स्व राशि में नीतिरहित।

द्वितीय भारवसूर्य ...
१. उच्च राशि में, राज सम्मान से धन ।
 २. उच्च नवांश में, राज सेवा से धन। 
३. शुभ ग्रह के नवांश में, सुलोक दक्षता से धन ।
४. नीच राशि में, पाप से धन। 
५. नीच नवांश में, स्थूलजों से धन।
६. पाप नवांश में चोरी से धन ।
७. मित्रराशि में, कामाचार से धन ।
 ८. मित्र नवांश में, लोभ से धन ।
 ९. वर्गोत्तम में परनारी से धन।
 १०. शत्रु राशि में, स्वल्प धन ।
 ११. शत्रु नवांश में, नीच सेवा से धन।
 १२. स्व राशि में, भृत्यकर्म से धन ।

तृतीय भावस्य सूर्य...

 १. उच्च राशि में, राजा ।
२. उच्च नवांश में, राजपुत्र ।
 ३. शुभग्रह के नवांश में, सार्वभौम । 
४. नीच राशि में, दुष्ट । 
५. नीच नवांश में, भिक्षुक ।
६. पाप नवांश में, अग्रविरोधी । 
७. मित्रराशि में, चारण ।
 ८. मित्र नवांश में, ब्राह्मणवृत्ति ।
 ९. वर्गोत्तम में, कुलीन।
 १०. शत्रु राशि में, शास्त्रविद् । 
११. शत्रु नवांश में, वैरिक्षतांगी। 
१२. स्व राशि में, निर्गुणी।

चतुर्थ भावस्थ सूर्य ...

१. उच्च राशि में, कष्ट से । सुख प्राप्ति।
 २. उच्च नवांश में, अल्प धन से सुखी।
 ३. शुभ ग्रह के नवांश में, परदारा से सुखी। 
४. नीच राशि में, नवीन व्यवसाय से दुःखी। 
५. नीच नवांश में, दुःखादय । 
६. पाप नवांश में, श्रृण से दुःखी। 
७. मित्रराशि में, पाप कर्मा। 
८. मित्र नवांश में, चौर कर्मा। 
९. वर्गोत्तम में नित्य श्रीयमान।
 १०. शत्रु राशि में, बुद्धरत ।
११. शत्रु नवांश में, पर सेवा से सुखी ।
 १२. स्व राशि में, हिंसनकर्मा, बन्धनकर्मा । 

पंचम भावस्थ सूर्य...
 १. उच्च राशि में, हिंसक पुत्रवान् ।
२. उच्च नवांश में, अल्पायु पुत्रवाला। 
३. शुभनवांश में, रोगी, दीन पुत्र । 
४. नीच राशि में, जाति नष्टकपुत्र ।
 ५. नीच नवांश में, विकलांग पुत्र ।
 ६. पाप नवांश में, गर्भनष्ट |
७. मित्रराशि में, तीक्ष्णभाग्यशाली पुत्र ।
 ८. मित्र नवांश में, दुःशील पुत्र ।
 ९. वर्गोत्तम में, व्यसनीपुत्र । 
१०. शत्रु राशि में, परदारज पुत्र ।
 ११. शत्रु नवांश में, परस्त्रीज पुत्र ।
 १२. स्व राशि में, विगुण एवं चौर पुत्र वाला।

षष्ठ भावस्थ सूर्य...

 १. उच्च राशि में, श्रेष्ठमान्य । 
२. उच्च नवांश में वित्र विद्वान् । 
३. शुभनवांश में, नृपतितुल्य । 
४. नीच राशि में, दूषित बुद्धि ।
 ५. नीच नवांश में स्वोरत । 
६. पाप नवांश में, दूसरों की चिन्ता करने वाला।
 ७. मित्रराशि में, अश्ववान् ।
 ८. मित्र नवांश में गोपालक।
 ९. वर्गोत्तम में स्वल्पशिल्पी । 
१०. शत्रु राशि में, कामिनीसुत । 
११. शत्रु नवांश में कुलटासुत।
 १२. स्व राशि में, विलासिनी स्त्री से युक्त ।

सप्तमस्थ सूर्य...

 १. उच्च राशि में, कलह प्रिया भार्या। 
२. उच्च नवांश में, नित्य परधर्मतत्पर भार्या . ।
३. शुभनवांश में दरिद्रा भार्या। 
४. नीच राशि में, व्यभिचारिणी भार्या।
 ५. नीच नवांश में, रोगिणी दारा । 
६. पाप नवांश में, विशीला योषिता ।
 ७. मित्रराशि में, घाततत्परा जाया ।
 ८. मित्र नवांश में हीनविता भामिनी। 
९. वर्गोत्तम में रतिप्रिया नारी।
१०. शत्रु राशि में, व्यसनी संगिनी ।
११. शत्रु नवांश में, स्वार्थी रमणी।
 १२. स्व राशि में, साहसी पत्नी।

अष्टमस्थ सूर्य ....
१. उच्च राशि में, भक्तिजाग्नि में प्रवेश से मरण । 
२. उच्च नवांश में, लोकलज्जा से मरण ।
 ३. शुभनवांश में, प्रमाद से मृत्यु।
 ४. नीच राशि में, दावाग्नि से दग्ध।
 ५. नीच नवांश में पाखण्ड पूर्ण कार्यों से अपमृत्यु । 
६. पाप नवांश में, उद्दीपन से नष्ट। 
७. मित्रराशि में, विषखाने से अन्त । 
८. मित्र नवांश में, बन्धन से मृत्यु । 
९. वर्गोत्तम में लोहे से घात ।
१०. शत्रु राशि में, रक्तकोप से अवसान।
 ११. शत्रु नवांश में, क्षय कास रोग से हानि।
 १२. स्व राशि में, स्त्री अपराध से पतन ।

नवमस्थ सूर्य...

 १. उच्च राशि में, तामसीधर्मा।
 २. उच्च नवांश में पाखण्डी ।
 ३. शुभनवांश में, अल्पधर्मी ।
 ४. नीच राशि में, धर्महीन ।
 ५. नीच नवांश में, पराश्रित धर्मा। 
६. पाप नवांश में, पिशुनाश्रयी संगति । 
७. मित्रराशि में, पापज धर्मी ।
 ८. मित्र नवांश में, अल्प अशनी ।
 ९. वर्गोत्तम में, कृतघ्नी । 
१०. शत्रु राशि में, वाक् धर्मी ।
 ११. शत्रु नवांश में, चौरसंश्रित ।
१२. स्व राशि में, पिशुनाश्रित धर्मा ।

दशमस्थ सूर्य ...

१. उच्च राशि में, धर्मव्रती । 
२. उच्च नवांश में, बन्धक एवं वधिक । 
३. शुभनवांश में, कलंकित ।
 ४. नीच राशि में, दासतायुक्त ।
५. नीच नवांश में, दुष्टराजा का सेवक । 
६. पाप नवांश में, वध एवं बन्धनयुक्त ।
७. मित्रराशि में, हिंसक प्रवृत्ति । 
८. मित्र नवांश में, वाणिज्य कर्मा।
९. वर्गोत्तम में, व्यवसायरत । 
१०. शत्रु राशि में, अशुभफल ।
 ११. शत्रु नवांश में, गर्हित निन्द्य । 
१२. स्व राशि में, अन्य सेवापरायण।

एकादशस्थ सूर्य- ...

१. उच्च राशि में, गजाश्वोष्ट एवं लतावृक्षादि से लाभ । 
२. उच्च नवांश में, कुत्ते से लाभ ।
३. शुभनवांश में, कौड़ी से लाभ । 
४. नीच राशि में दूषित अन्न से लाभ ।
५. नीच नवांश में, परस्त्री से लाभ । 
६. पाप नवांश में, सुहृदों से लाभ।
 ७. मित्रराशि में कुल की स्त्री से लाभ ।
 ८. मित्र नवांश में, श्रेष्ठ जनों से लाभ । 
९. वर्गोत्तम में, खल लोगों से लाभ । 
१०. शत्रु राशि में कम्बलों से लाभ ।
११. शत्रु नवांश में, दुष्टों से लाभ ।
 १२. स्व राशि में, गुणवानों से लाभ।

द्वादशस्य सूर्य ...

१. उच्च राशि में, बड़े कार्यों में व्यय । 
२. उच्च नवांश में, बड़े लोगों की सेवा पर व्यय । 
३. शुभनवांश में, ब्राह्मण एवं देवता पर।
 ४. नीच राशि में, दुर्जनों पर व्यय ।
 ५. नीच नवांश में, दुष्टा स्त्री पर व्यय । 
६. पाप नवांश में, अन्त्यजों पर व्यय । 
७. मित्रराशि में, मित्रों पर व्यय । 
८. मित्र नवांश में, लोगों के अनुरोध करने पर व्यय ।
९. वर्गोत्तम में, नृपाश्रय हो कर व्यय।
 १०. शत्रु राशि में, वेश्याओं पर व्यय ।
 ११. शत्रु नवांश में, कुलटाओं के स्नेहवश व्यय ।
 १२. स्व राशि में, भय (ज्ञान) वश व्यय । ग्रहों की युति दृष्टि से कथित फल में अन्तर आ जाता है।

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