काल पुरुष की कुण्डली में नवम स्थान
काल पुरुष की कुण्डली में नवम स्थान धनु आक्रान्त होता है। धनुपति गुरु ज्ञान है। धनु के ठीक सामने मिथुन है। इसका स्वामी बुध है। बुध बुद्धि है। संख्या ९ से ६ की उत्पत्ति होती है।
【९ +९= १८,
१८ - १२ = ६ ।】
संख्या ६ का स्वामी बुध है। ६= कन्या = बुध की उच्च एवं मूल त्रिकोण राशि बुध तो बुद्धि है ही। बुध की उच्च राशि कन्या उच्च वा उत्कृष्ट बुद्धि की द्योतक है। लग्न में पड़ने पर जातक बुद्धिमान होता है। संख्या ३ से १२ की उत्पत्ति होती है। ३ +९= १२ । १२ मीन राशि है। इसका स्वामी भी गुरु है । ३, ६, ९, १२ द्विस्वभाव राशियाँ हैं। अतः मिथुन एवं कन्या के स्वामी बुध से उद्भूत बुद्धि तथा गुरु से प्रजात ज्ञान- दोनों द्विस्वभाव हुए। यही कारण है कि हर जातक की बुद्धि द्विस्वभाव होती है तथा ज्ञान भी द्विस्वभाव होता है। इससे बुद्धि में द्वन्द्व पैदा होता है तथा ज्ञान में संदेह बुद्धि का स्थिर होना द्वन्द्व का नाश है। संदेह का समाप्त होना ब्रह्मज्ञान है। स्थिरबुद्धि जातक ब्रह्मज्ञानी होता है। ब्रह्मज्ञानी की बुद्धि स्थिर होती है। स्थिरबुद्धि ब्रह्मवेत्ता को मैं प्रणाम करता हूँ।
ज्योतिष का सामान्य सिद्धान्त है-चर राशि की अपेक्षा अचर राशि बली होती है, अचर राशि से द्विस्वभाव राशि बलवान होती है। इस प्रकार, द्विस्य राशि पर और अचर दोनों से बलवान है। राशिचक्र की चार द्विस्वभाव राशियाँ ३, ६, ९, १२ सर्वाधिक बली हुई। ये चार राशियाँ बुद्धि और ज्ञान की द्योतक हैं। ज्ञानी हो बुद्धिमान होता है। इसलिये बुद्धिमान् सबसे बलवान् है। बुद्धिमानेव बलवत्तमः। बुद्धिमान् का बल अदृश्य होता है। अतएव यह बल अदृष्ट नाम वाला हुआ। इससे स्पष्ट हो जाता है कि अदृष्टप्रारब्ध एक चतुर्भुज है जिसकी चार भुजाएँ ३, ६, ९, १२ राशि बिन्दुओं को मिलाने से बनती हैं। इस चतुर्भुज को विकर्ण ३.९, तथा ६, १२ राशि बिन्दुओं को मिलाने से बनते हैं। ये विकर्ण क्रमशः श्रद्धा एवं विश्वास के हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बिना श्रद्धा के ज्ञान नहीं होता तथा बिना विश्वास के बुद्धि की जड़ता जाती नहीं कथन है-
"श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।"( गीता ४ । ३९)
(जिस मनुष्य में श्रद्धा पायी जाती है, उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है)।
"विश्वास: सम्पदा मूलम् । "( योग वासिष्ठ नि.उ. ४७ । ८ । )
(विश्वास समस्त धनों का मूल है)।
ज्ञान एवं सम्पदा का होना ही भाग्य है। ज्ञान हो, भौतिक सुख के साधन हो, इससे बड़ा भाग्य और क्या होगा ?
गुरु ज्ञान है। यह भाग्य का कारक है। बुध शाता है। इसलिये भाग्य का कारक बुध भी है। बुध भी गुरु के बराबर है। इसमें प्रमाण है ९= ३ + ६। नव संख्या तीन एवं छः का योग है। नव का स्वामी गुरु तथा तीन एवं छः का स्वामी बुध है। इसके अतिरिक्त गुरु का क्षेत्रजपुत्र है, बुध गुरु के क्षेत्र में चन्द्रमा द्वारा उत्पन्न बुध कोश कहा गया है। ज्ञ बुद्धिमान् एवं विद्वान् पुरुष। इस का अर्थ हुआ बुध में बुद्धि एवं ज्ञान दोनों है। बुध में ज्ञान क्यों है। इसका भी प्रमाण है। बुध पुत्र है चन्द्रमा का चन्द्रमा मन है। मन ज्ञानेन्द्रिय है। ज्ञानेन्द्रिय से उत्पन्न में ज्ञान अवश्य होगा। अतः बुध ज्ञान है। इस प्रकार गुरु = बुध सिद्ध हुआ।
३ बल है। ६ ऐश्वर्य है। ९= ३ + ६ होने से ज्ञान में बल एवं समस्त ऐश्वयों का समाहार है। इसलिये ९ से बड़ा कोई अंक नहीं है। जिससे बड़ा कोई नहीं वहीं भाग्य है। भाग्य सर्वोपरि है, इसे कोई नकार नहीं सकता। गुरु एवं बुध के ज्ञानत्व में अन्तर है। गुरु मह पृथ्वी से दूर है। बुध ग्रह पृथ्वी के निकट है। इसलिये गुरु का ज्ञान पृथ्वी से दूर वा अपार्थिव, अलौकिक है तथा बुध का ज्ञान पूर्णतः पार्थिव/लौकिक है। गुरु को गति मन्द है। बुध की गति तीव्र है। अतः बुध का ज्ञान चथल है तथा गुरु का स्थिर बुध लघु आकार का तथा गुरु वृहद आकार का यह है अतः बुध का ज्ञान हल्का और गुरु का ज्ञान भारी है। अब हमें उसी को भाग्यवान् कहना चाहिये जो लौकिक एवं अलौकिक ज्ञान से सम्पन्न हो।
अदृष्ट का नाम भाग्य है। अदृष्ट = जो नहीं देखा गया है किन्तु है और जिसके प्रभाव का अनुभव सब को होता है। इस प्रकार अदृष्ट गुप्त, छिपा हुआ किन्तु प्रभावकारी नवम भाव अदृष्ट है। दोनों जाँघे अदृष्ट होती हैं। सभ्य स्त्री पुरुष इन्हें छिपाये रखते हैं। दोनों हाथ दृष्ट है। यह भाव ३ है। दृष्ट कर्म भाव ३ में तथा इस कर्म का मूल भाव ९ में है। ये दोनों भाव परस्पर अभिमुख हैं। दृष्ट अदृष्ट अदृश्य कर्म। दृष्ट तो सब लोग जानते हैं। अदृष्ट कोई नहीं जानता। इसी को देव कहते हैं। बिना देव के कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। यह बात भगवान् ने अपने मुखारबिन्द से स्वयं कही है।
"पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते शोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥"
(गीता १८/ १३)
महाबाहो ! सर्वकर्मणाम् सिद्धये एतानि पञ्च कारणानि = हे महाबाहु अर्जुन । सभी कार्यों की सिद्धि के लिये ये पाँच कारण हैं।
कृतान्ते = सभी क्रियाओं के समापन में।
सांख्ये प्रोक्तानि = सांख्य शास्त्र में कहे गये हैं।
(तानि त्वं) में निबोध =उन्हें तू मुझसे भली प्रकार जान।
(सम्+ ख्या (कथने) + अङ् + टाप= संख्या + अण्= सांख्य ।सांख्य= परिपूर्ण कथन =ज्ञान शास्त्र । इसके प्रवक्ता कपिल मुनि हैं। इसका आधार योग है। योगियों का यह शास्त्र अति प्राचीन है) ये पाँच कारण कौन कौन हैं ? आगे भगवान् कहते हैं-
"अधिष्ठान तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।"
(गीता १८ । १४)
१. अधिष्ठानम् =जिसमे रह कर कर्म किया जाता है अर्थात् शरीर ।
२. कर्ता = शरीरधारी जीवात्मा ।
३. करणम् = १० इन्द्रियों का समुदाय + मन + बुद्धि + अहंकार ।
४. चेष्टा = प्रयत्न, प्रयास, व्यवहार।
५. दैवम् = भाग्य, अदृष्ट ।
ये पाँच करण / साधन हैं, जिनसे कार्य की सिद्धि होती है। इनमें से एक भी न हो तो कार्य सिद्ध हो ही नहीं सकता। इन पाँचों में भी पांचवां भाग्य/ दैव सर्वोपरि है।
अत्र अधिष्ठानं च कर्ता च पृथक् विधम् करणं च विविधाः पृथक् चेष्टाः तथा पञ्चमं दैवं एव-कारणानि ।
शरीर, जीवात्मा, त्रयोदश करण (५ ज्ञानेन्द्रिय + ५ कर्मेन्द्रिय + मन + बुद्धि + अहंकार), विविध प्रकार की अलग चेष्टाएँ तथा दैव ही क्रिया की सिद्धि में पाँच कारण कहे गये हैं। कार्य की असिद्धि में जातक को विचार करना चाहिये कि उसमें किस कारण का योग नहीं है ? दैव को व्यर्थ में दोष देना मूर्खता है। यद्यपि यह है सब से प्रबल इसकी प्रबलता का लोहा सब लोग मानते हैं। रहीम का यह दोहा भाग्य प्राबल्य का द्योतक है-
'रहिमन चुप है बैठिये, देखि दिनन को फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लागि हैं देर ॥'
(दिन = भाग्य प्रकाश)।
'दैवमेव परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम्। दैवेनाक्रम्यते सर्वं दैवं हि परमा गतिः ॥'
दैव हो सर्वोपरि है-ऐसा मानता हूँ तथा पुरुषार्थ निरर्थक है। देव सबको पार कर जाता है। देव का पार कोई नहीं पाता। दैव परम पुरुषार्थ है।
दैव कोई अलग वस्तु तो है नहीं। यह भी कर्म है। यह अपना प्रभाव डालने में अमोध है। इसलिये पुरुषार्थ उद्यम से पीछे नहीं हटना चाहिये। विष्णु शर्मा का कथन है-
"पूर्वजन्म कृतं कर्म तद्दैवमिति कथ्यते । तस्मात् पुरुषकारेण यलं कुर्यादः ॥'
(पञ्चतन्त्र )
पूर्वजन्म में किया गया कर्म देव नाम से जाना जाता है। इसलिये जातक को यत्नपूर्वक आलस्यत्याग कर पुरुषार्थ / उद्योग करना चाहिये। यह नीति है।
कर्मफल तीन प्रकार का होता है। भगवान् कहते हैं-
"अनिष्टमिष्टं मिश्र च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।"(गीता १८ । १२)
१. अनिष्टम् अशुभ, दुःखद ।
२. इष्टम् = शुभ, सुखप्रद ।
३. मिश्रम् = मिलाजुला, सुख एवं दुःख दोनों को देने वाला।
तब तक कर्म करते रहना चाहिये, जब तक कि तत्व ज्ञान न उत्पन्न हो जाय। वाक्य है-
"तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता ।" (श्रीमद् भागवत् )
चाण्डाल हो वा ब्राह्मण हो, जो भाग्यवान् होता है, वही आदर पाता है। कथन है-
"चाण्डाल वा द्विजेो वापि भाग्यवानेव पूज्यते।"
( बृहन्नारदीय पुराण ११ / १४६ )
इसलिये भाग्य के प्रकाशक भगवान् भासकर को मैं प्रणाम करता हूँ। इस सूर्य का प्रच्छन्न प्रकाश भाग्य है तथा प्रकट प्रकाश दिन है। भानु भाग्य बनकर भासता है। इस सत्य से अवगत साधु को मेरा सतत प्रणाम !
भाव ३ कर्म भूमि है। इस भूमि में पड़ा बीज जब उगता है और वृक्ष का आकार लेता है तो उसकी जड़ें नवम में फैलती है, तना एवं शाखा प्रशाखाएँ पत्तियां दशम में फैलती हैं। इसमें जो फल लगता है, वह एकादश भाव में गिरता है। जितना अधिक एवं जितना सुन्दर फल होगा, जातक उतना ही भाग्यवान् होगा। यह ज्योतिष सम्मत सत्य है।
भाव ९, १०, ११ में यह हों तो जातक का भाग्य वृक्ष सुदृढ़, छायायुक्त एवं फल देने वाला होगा। भाभीज है। इन चारों भावों से कर्म चतुर्व्यूह कोसंरचना होती है ये चारों भाव सम्पूर्ण महों से युक्त हैं तो जातक अमित भाग्यशाली होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं। इन चारों भावों के परिप्रेक्ष्य में भाग्य को देखना चाहिये।
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