आदर्शवाद
आदर्शवाद
विचारवाद या आदर्शवाद या प्रत्ययवाद (Idealism ; Ideal= विचार या प्रत्यय) उन विचारों और मान्यताओं की समेकित विचारधारा है जिनके अनुसार इस जगत की समस्त वस्तुएं विचार (Idea) या चेतना (Consciousness) की अभिव्यक्ति है। सृष्टि का सारतत्त्व जड़ पदार्थ (Matter) नहीं अपितु चेतना है। आदर्शवाद जड़ता या भौतिकवाद का विपरीत रूप प्रस्तुत करता है।[1] यह आत्मिक-अभौतिक के प्राथमिक होने तथा भौतिक के द्वितीयक होने के सिद्धांत को अपना आधार बनाता है, जो उसे देश-काल में जगत की परिमितता और जगत की ईश्वर द्वारा रचना के विषय में धर्म के जड़सूत्रों के निकट पहुँचाता है। आदर्शवाद चेतना को प्रकृति से अलग करके देखता है, जिसके फलस्वरूप वह मानव चेतना और संज्ञान की प्रक्रिया को अनिवार्यतः रहस्यमय बनाता है और अक्सर संशयवाद तथा अज्ञेयवाद की तरफ बढ़ने लगता है।[2]
प्रत्यय और आदर्श
कुछ विचारकों के अनुसार मुनष्य और अन्य प्राणियों में प्रमुख भेद यह है कि मनुष्य प्रत्ययों का प्रयोग कर सकता है और अन्य प्राणियों में यह क्षमता विद्यमान नहीं। कुत्ता दो मनुष्यों को देखता है, परंतु २ को उसने कभी नहीं देखा। प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं- वैज्ञानिक और नैतिक। संख्या, गुण, मात्रा आदि वैज्ञानिक प्रत्ययों का अस्तित्व तो असंदिग्ध है, परंतु नैतिक प्रत्ययों का अस्तित्व विवाद का विषय बना रहा है। हम कहते हैं- 'आज मौसम बहुत अच्छा है'। यहाँ हम अच्छेपन का वर्णन करते हैं और इसके साथ अच्छाई के अधिक न्यून होने की ओर संकेत करते हैं। इसी प्रकार का भेद कर्मो के संबंध में भी किया जाता है। नैतिक प्रत्यय को आदर्श भी कहते हैं। आदर्श एक ऐसी स्थिति है, जो-
- (१) वर्तमान में विद्यमान नहीं,
- (२) वर्तमान स्थिति की अपेक्षा अधिक मूल्यवान् है,
- (३) अनुकरण करने के योग्य है, और
- (४) वास्तविक स्थिति का मूल्य जांचने के लिए मापक का काम देती है। आदर्श के प्रत्यय में मूल्य का प्रत्यय निहित है। मूल्य के अस्तित्व की बाबत हम क्या कह सकते हैं?
कुछ लोग मूल्य को मानव कल्पना का पद ही देते हैं। जो वस्तु किसी कारण से हमें आकर्षित करती है, वह हमारी दृष्टि में मूल्यवान या भद्र है। इसके विपरीत अफ़लातून के विचार में प्रत्यय या आदर्श ही वास्तविक अस्तित्व रखते हैं, दृष्ट वस्तुओं का अस्तित्व तो छाया मात्र है। एक तीसरे मत के अनुसार, जिसका प्रतिनिधित्व अरस्तू करता है, आदर्श वास्तविकता का आरंभ नहीं, अपितु 'अंत' है। 'नीति' के आरंभ में ही वह कहता है कि सारी वस्तुएँ आदर्श की ओर चल रही हैं।
मूल्यों में उच्च और निम्न का भेद होता है। जब हम कहते हैं कि 'क' , 'ख' से उत्तम है, तब हमारा आशय यही होता है कि सर्वोत्तम से ख की अपेक्षा क का अंतर थोड़ा है। मूल्य क तुलना का आधार सर्वोत्तम है। इसे 'निःश्रेयस' कहते हैं। प्राचीन यूनान और भारत के लिए निःश्रेयस या सर्वश्रेष्ठ मूल्य के स्वरूप का समझना ही नीति में प्रमुख प्रश्न था।
नि:श्रेयस का स्वरूप
नि:श्रेयस या सर्वोच्च आदर्श के स्वरूप के संबंध में सभी इससे सहमत हैं कि यह चेतना से संबद्ध है, परंतु ज्यों ही हम जानना चाहते हैं कि चेतना में कौन सा अंश साध्यमूल्य है, त्योंही मतभेद प्रस्तुत हो जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि सुख का उपभोग ऐसा मूल्य है। कुछ ज्ञान, बुद्धिमत्ता, प्रेम या शिवसंकल्प को यह पद देते हैं। कुछ इस विकल्प में एकवाद को छोड़कर अनेकवाद की शरण लेते हैं ओर कहते हैं कि एक से अधिक वस्तुएँ साध्यमूल्य हैं किसी वस्तु के साध्यमूल्य होने या न होने का निर्णय करने के लिए डाक्टर मूर ने निम्नलिखित सुझाव दिया है: कल्पना करो कि दो विकल्पों मे पूर्ण समानता है, सिवाय इस भेद के कि एक विशेष वस्तु एक विप्लव में विद्यमान है। इन दोनों विप्लवों में तुम्हारी बुद्धि किसके अस्तित्व को अधिक उपयुक्त समझती है? जो वस्तु ऐसी स्थिति में एक विप्लव को दूसरे से अधिक उपयुक्त बनाती है, वह साध्यमूल्य हैं।
आदर्शवाद की मान्य धारणाएँ
मूल्यों का अस्तित्व, उनमें श्रेष्ठता का भेद ओर सर्वश्रेष्ठ मूल्य का अस्तित्व आदर्शवाद की मौलिक धारणा है। इससे संबद्ध कुछ अन्य धारणाएँ भी आदर्शवादियों के लिए मान्य हैं। इनमें से हम यहाँ तीन पर विचार करेंगे:
- (१) सामान्य का पद विशेष से ऊँचा है। प्रत्येक बुद्धिवंत बुद्धिवंत होने के नाते भद्र में भाग लेने का अधिकारी है।
- (२) आध्यात्मिक भद्र का मूल्य प्राकृतिक भद्र से अधिक है।
- (३) बुद्धिवंत प्राणी (मनुष्य) में भद्र को सिद्ध करने की क्षमता है। मनुष्य स्वाधीन कर्ता है।
इन तीनों धारणाओं पर तनिक विचार की आवश्यकता है।
स्वार्थ और सर्वार्थ
सामान्य और विशेष का भेद स्वार्थवाद और सर्वार्थवाद के विवाद में प्रकट होता है। भोगवाद (सुखवाद) ने स्वार्थ से आरंभ किया, परंतु शीघ्र ही इसके ध्येय में स्वार्थ ने स्थान प्राप्त कर लिया। मनुष्य का अंतिम उद्देश्य अधिक से अधिक संख्या का अधिक से अधिक उपभोग है। दूसरी ओर कांट ने भी कहा कि निरपेक्ष आदेश की दृष्टि में सारे मनुष्य एक समान साध्य हैं, कोई मनुष्य भी साधन मात्र नहीं। मृत्यु की तरह नैतिक जीवन सभी भेदों को मिटा देता है। कोई मनुष्य कर्तव्य से ऊपर नहीं, कोई अधिकारों से वंचित नहीं।
आध्यात्मिक और प्राकृतिक मूल्य
इस विषय में कांट का कथन प्रसिद्ध है: जगत में ओर इसके परे भी हम शिवसंकल्प के अतिरिक्त किसी वस्तु का भी चिंतन नहीं कर सकते, जो बिना किसी शर्त के शुभ या भद्र हो। जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे सुखवादी ने भी कहा, तृप्त सूअर से अतृप्त सुकरात होना उत्तम है। मिल ने यह नहीं देखा कि इस स्वीकृति में वह अपने सिद्धांत से हटकर आदर्शवाद का समर्थन कर रहे हैं। सुकरात में ऐसा आध्यात्मिक अंश है जो सूअर में विद्यमान नहीं।
टामस हिल ग्रीन ने विस्तार से यह बताने का यत्न किया है कि आधुनिक नैतिक भावना प्राचीन यूनान की भावना से इन दो बातों में बहुत आगे बढ़ी है-मनुष्य और मनुष्य में भेद कम हो गया है और जीवन में आध्यात्मिक पक्ष अग्रसर हो रहा है।
नैतिक स्वाधीनता
कांट के विचार में मानव प्रकृति में प्रमुख अंश 'नैतिक भावना' का है, वह अनुभव करता है कि कर्त्तव्यपालन की मांग शेष सभी मांगों से अधिक अधिकार रखती है, नैतिक आदेश 'निरपेक्ष आदेश' है। इस स्वीकृति के साथ नैतिक स्वाधीनता की स्वीकृति भी अनिवार्य हो जाती है। 'तुम्हें करना चाहिए, इसलिए तुम कर सकते हो।' योग्यता के अभाव में उत्तरदायित्व का प्रश्न उठ ही नहीं सकता।
श्रेष्ठ, श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम
यहाँ एक कठिन स्थिति प्रस्तुत हो जाती है: नैतिक आदर्श श्रेष्ठतम की सिद्धि है या उसकी ओर चलते जाना है? जिस अवस्था को हम श्रेष्ठतम समझते हैं, उसे प्राप्त करने पर उसे श्रेष्ठतम ही पाते हैं। जहाँ कहीं भी हम पहुँचे, त्रुटि ओर अपूर्णता बनी रहती है। स्वयं कांट ने कहा है कि हमारा अंतिम उद्देश्य पूर्णता है और इसकी सिद्धि के लिए अनंत काल की आवश्यकता है। कुछ विचारक तो कहते हैं कि अपूर्णता का कुछ अंश रहना ही चाहिए। सोर्टो अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'नैतिक मूल्य' में कहता है: 'कल्पना करो कि सारे मूल्यों की सिद्धि हो गई है। ऐसा होने पर नीति का क्या बनेगा? आगे बढ़ने के लिए कोई आदर्श रहेगा ही नहीं। सफलता सारे प्रयत्न का अंत कर देगी और इस तरह सिद्धि प्राप्त नैतिक आदर्श जीवन को पूर्ण करने में समाप्त कर देगा। इस कठिनाई के कारण ब्रैडले ने कहा कि नैतिक जीवन में आंतरिक विरोध है: सारे नैतिक प्रयत्न का अंत इसकी अपनी हत्या है।
शिक्षा में आदर्शवाद
शिक्षा आदिकाल से ही विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं से प्रभावित होती चली आ रही है, किन्तु इस पर सबसे अधिक प्रभाव आदर्शवाद का पड़ा है। शिक्षा के क्षेत्र में आदर्शवाद को प्रमुखता देने वालों में सर्वप्रथम प्लेटो, कॉमेनियस, पेस्टालॉजी तथा फ्रोबेल के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
आदर्शवादियों के अनुसार शिक्षा एक ‘चेतना' अथवा 'बौद्धिक प्रक्रिया’ है जो कि बालक में सद्गुणों का विकास कर उसे एक प्राकृतिक प्राणी से आध्यात्मिक प्राणी बनाती हैं। सांस्कृतिक परम्परायें एवं ज्ञान इस क्रिया को सम्पन्न करने का साधन हैं। इस क्रिया का ‘साध्य का लक्ष्य’ छात्र को आत्मानुभूति करने का अवसर प्रदान करना तथा उनका चरित्र निर्माण करना होता है। इस प्रकार आदर्शवादी विचारधारा के अनुसार शिक्षा वह चेतनापूर्ण एवं बौद्धिक प्रक्रिया है जिसमें गुरु के द्वारा शिष्य को आत्मानुभूति करायी जाती है। शिक्षा की इस अवधारणा से पता चलता है कि शिक्षा कोई एकांगी प्रक्रिया नहीं है अपितु दो धु्रवों के मध्य चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें एक धु्रव शिक्षार्थी है जिसकी मूल प्रकृति का परिष्कार किया जाता है तथा दूसरा धु्रव शिक्षक होता है जो बालक की मूल प्रकृति का ‘शोधन’ एवं मार्गान्तरीकरण कर उसे शाश्वत मूल्यों एवं आदर्शों से अवगत कराता है ताकि वह प्राकृतिक प्राणी से आध्यात्मिक प्राणी में परिवर्तित हो सके।
शिक्षा के उद्देश्य तथा आदर्शवाद
आदर्शवादियों के अनुसार मनुष्य-जीवन का अन्तिम उद्देश्य आत्मा-परमात्मा के चरम स्वरूप को जानना है, इसी को आत्मानुभूति, आदर्श व्यक्तित्व की प्राप्ति, ईश्वर की प्राप्ति तथा परम आनन्द की प्राप्ति कहा जाता है। आत्मा-परमात्मा के चरम स्वरूप को जानने के लिए आदर्शवादियों के अनुसार मनुष्य को चार सोपान पार करने होते हैं। प्रथम सोपान पर उसे अपने ‘प्राकृतिक स्व’ का विकास करना होता है। दूसरे सोपान पर उसे अपने ‘सामाजिक स्व’ का विकास करना होता है। तीसरे सोपान पर उसे अपने ‘मानसिक स्व’ का विकास करना होता है तथा अन्तिम सोपान पर उसे ‘आध्यात्मिक स्व’ का विकास करना होता है।
आदर्शवादी विचारधारा के अनुसार मानव प्राणी ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना है जिसको उसने असीमित शक्तियाँ प्रदान की हैं। इन्हीं विभिन्न शक्तियों एवं क्षमताओं के योग से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसीलिए आदर्शवादी विचारक व्यक्तित्व को ऊंचा उठाना अथवा उसमें निहित विभिन्न सर्वोच्च शक्तियों एवं क्षमताओं का प्रकटीकरण एवं अच्छे मार्ग की ओर ले जाना ही शिक्षा का उद्देश्य मानते हैं। स्पष्ट है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व महत्वपूर्ण होता है और व्यक्ति के भौतिक शरीर की अपेक्षा ‘आत्मा’ का विशेष महत्व होता है। इसलिए आदर्शवाद के अनुसार मानव-जीवन का उद्देश्य इसी ‘आत्मा’ का बोध करना है।
आत्मानुभूति के लिए आत्म-प्रकाशन भी आवश्यक है। आत्म प्रकाशन के लिए ‘सामाजिक स्व’ को विकसित करना आवश्यक है। सामाजिक स्व के विकास का अर्थ है-मनुष्य समाज द्वारा स्वीकृत नियमों का पालन करता है, उसकी पसन्द सामाजिक स्वीकृति-अस्वीकृति पर निर्भर करती है। आदर्शवादी यह मानते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी संस्कृति है, रहन-सहन, रीति रिवाज, भाषा साहित्य, कला संगीत एवं मूल्य हैं। ये ही उसे प्राकृतिक ‘स्व’ से सामाजिक स्व की ओर अग्रसर करते हैं, समाज एवं वातावरण के साथ भलीभाँति समायोजन स्थापित करने के लिए व्यक्ति को ‘आत्म प्रकाशन’ का अवसर मिलना आवश्यक है।
आत्म प्रकाशन के लिए ‘बौद्धिक स्व’ का विकास आवश्यक है। यह वह स्थिति होती है जब मनुष्य का व्यवहार सामाजिक स्वीकृति-अस्वीकृति से नियंत्रित न होकर उसकी बुद्धि एवं विवेक से नियंत्रित होता है। प्लेटो का विचार है कि मनुष्य की बुद्धि एवं विवेक उसके समस्त आदर्शों, कृत्यों एवं आध्यात्मिक चेष्टाओं का आधार होते हैं। बिना बुद्धि के ज्ञान नहीं हो सकता, बिना ज्ञान के विवेक नहीं हो सकता और बिना विवेक के सत्य-असत्य, शिव-अशिव एवं सुन्दर-असुन्दर में भेद नहीं किया जा सकता है तथा सत्यं शिवं सुन्दरम् की प्राप्ति नहीं की जा सकती है।
आत्मानुभूति से हम वास्तविक सत्य का दर्शन करते हैं। आदर्शवादियों का विश्वास है कि जब मनुष्य अपने ‘प्राकृतिक स्व’ एवं ‘सामाजिक स्व’ से ऊपर उठकर अपने ‘बौद्धिक स्व’ में नियंत्रित होने लगता है तो वह धीरे-धीरे स्वत: ‘आध्यात्मिक स्व’ के क्षेत्र में प्रवेश करने लगता है। प्लेटो का विचार है कि मनुष्य की प्रवृत्ति सत्यं, शिवं तथा सुन्दरम् की तरफ झुकी होती है। वह सदैव सत्य की खोज में तत्पर रहता है और जो कल्याणकारी एवं सुन्दर है, उसे स्वीकार करता है तथा जो कल्याणकारी एवं सुन्दर नहीं है, उसका त्याग करता है। आदर्शवादी मनुष्य को इस प्रक्रिया में प्रशिक्षित करने पर बल देते हैं।
उपर्युक्त लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शनै: शनै: दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना आवश्यक है। इस भौतिक जगत के नानात्व से मुक्ति ही शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए। कहा भी गया है-
सा विद्या या विमुक्तये
अर्थात् विद्या (ज्ञान) वह है जो मुक्ति प्रदान करे। इससे स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे व्यक्तित्व का चरम विकास ही आदर्शवादी शिक्षा का उद्देश्य है जिसमें व्यक्ति आत्मानुभूति कर सत्यं, शिवं तथा सुन्दरं की प्राप्ति कर सके। आत्मानुभूति का बोध प्राकृतिक देन नहीं है इसलिए व्यक्ति को सतत अभ्यास एवं प्रयत्न द्वारा इसे प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिये।
पाठ्यक्रम तथा आदर्शवाद
आदर्शवादीें विचारों ने शिक्षा के उद्देश्यों का ही निर्धारण नहीं किया है अपितु उसके लिए उपयुक्त पाठ्यक्रम के स्वरूप को भी निर्धारित किया है। क्योंकि शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति तभी संभव है जबकि पाठ्यक्रम भी उसी के अनुसार हो। आदर्शवाद व्यक्ति के व्यक्तित्व का उत्कर्ष अथवा आत्मानुभूति के शाश्वत आदर्शों की प्राप्ति तथा सांस्कृतिक भौतिक जगत को अन्तिम सत्य नहीं मानता किन्तु सत्य का आभास तो मानता ही है इसी भौतिक जगत में रहकर एवं भौतिक वातावरण के सहयोग से ही आदर्शवाद चरम सत्य को प्राप्त करने का परामर्श देता है। मनुष्य का आध्यात्मिक वातावरण अधिक महत्वपूर्ण होता है किन्तु प्राकृतिक वातावरण की उपेक्षा नहीं की जा सकती। व्यक्ति शरीर और मन का संयोग होता है और इसमें मन अधिक महत्वपूर्ण होता है। किन्तु आदर्शवादी मानते हैं कि यदि शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति न की गयी तो मानसिक क्रिया भी दु:साध्य हो जायेगी। व्यक्ति आत्मानुभूति की ओर तभी बढ़ सकता है जब उसका शारीरिक विकास हो चुका होता है। अत: भौतिक जगत का ज्ञान आवश्यक है।
यूनानी दार्शनिक प्लेटो के अनुसार शिक्षा का चरम लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है। अत: पाठ्यक्रम में उन्हीं विषयों को सम्मिलित करने पर बल देना चाहिए जिसके माध्यम से उक्त लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम सत्यं, शिवं तथा सुन्दरं इन तीनों तत्वों को प्राप्त करना आवश्यक है। ये तीनों आध्यात्मिक मूल्य मनुष्य की क्रमश: बौद्धिक, नैतिक एवं कलात्मक क्रियाओं के द्वारा प्राप्त होते हैं। अत: प्लेटो पाठ्यचर्या में उन्हीं विषयों एवं क्रियाओं के समावेश पर बल देते हैं जो मानव को उपर्युक्त क्रियाओं में दक्षता प्रदान करे। उन्होंने बौद्धिक क्रियाओं के लिए भाषा, साहित्य, इतिहास, भूगोल, गणित तथा शारीरिक विज्ञान को महत्वपूर्ण बता
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