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Showing posts from February, 2023

अंतर्जातीय विवाह

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अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाहों के आधार पर जातियों की उत्पत्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन सबसे पहले बौधायन ने किया। उन्होंने चांडाल, रथकार, वेण, निषाद, पुक्कुस आदि जातियों का उल्लेख किया है। बौद्ध ग्रन्थों में इन्हें हीन जाति कहा गया है। मेगस्थनीज ने भारतीय जनता के सात जातियों में विभाजित होने तथा अपनी ही जाति में विवाह करने का उल्लेख किया है। यद्यपि मनुस्मृति के अध्ययन से पता चलता है कि अनुलोम विवाहों की अनुमति थी। मनु ने अंबष्ठ, निषाद, सूत, उग्र, विदेह, मागघ आदि 57 जातियों का उल्लेख किया है उसके अनुसार इन सभी जातियों की उत्पत्ति अन्तरजातीय विवाहों के फलस्वरूप हुई। इसी बात को महाभारत ने भी प्रमाणित किया है। भीष्म के अनुसार प्रतिलोम विवाहों के फलस्वरूप ही नई जातियां उत्पन्न हुई। परन्तु अन्तरजातीय विवाहों से जातियों की उत्पत्ति का सिद्धान्त धर्मशास्त्रकारों की कल्पना लगती है क्योंकि हम देख चुके हैं कि कुछ जातियां व्यवसाय के आधार पर, कुछ प्रजाति के आधार पर तथा कुछ जातियाँ क्षेत्र के आधार पर बनी एक ही जाति की उत्पत्ति के विषय में धर्मशास्त्रकार अलग-अलग मत भी रखते हैं जैसे कुछ जातियों का विवरण ...

Nakshatra gyan

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अभिजित को छोड़ कर २७ नक्षत्र और उनके १०८ चरणों पर विचार किया गया। १०८ मनकों की माला में अभिजित् का एक मनका सुमेरु है। इसका उल्लंघन नहीं किया जाता। यह चरणहीन है। २८ नक्षत्र हैं। चन्द्रमा २७ का भोग करता है, अभिजित का नहीं। इस विषय में शास्त्र प्रमाण है। अतः अभिजित् को नक्षत्र मण्डली से बहिष्कृत कर रहा हूँ। २८ की संख्या अशुभ है। भागवत में २८ नरकों का वर्णन आया है। इसके अतिरिक्त २८ की संख्या में २ का अंक शुक्र का तथा ८ का अंक मंगल का है। २८ में शुक्र को मंगल दूषित कर रहा है। वृष और वृश्चिक का साथ अशुभ परिणामी है। दूसरे प्रकार से, २८ + ९ = ३ आवृत्ति, १ शेष १ मंगल का अंक होने से अशुभ परिणामी है। जब कि २७ की संख्या में २ और ७ के दोनों अंक शुक्र के हैं। वृष और तुला का मेल शुक्र के स्वामित्व के कारण पूर्ण शुभ है। दूसरे प्रकार से, २७÷ ९= ३ आवृत्ति ० शेष शून्य असत् वा ब्रह्म है। अतः वरणीय है। नक्षत्रों की संख्या २७ मानने में यह एक रहस्य है। सभी नक्षत्रों का कोई न कोई गोत्र होता है। अभिजित गोत्र होन है चन्द्रमा से अयुक्त, पादहीन, गोत्रहीन नक्षत्र का वर्णन करना मेरे लिये अभीष्ट नहीं है। फिर अभिजित्...

वैदिक ज्योतिष।

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#वैदिक_ज्योतिष_प्रवचन_संख्या८५  सप्तम भाव हिरण्यम् है। हिरण्य का अर्थ है सोना, सोने का पात्र, वीर्य, जिसका हरण किया जाय वा जो हरण करे, मूल्यवान् वस्तु स्त्री की योनि हरिण्यम् अर्थात् स्वर्णपात्र है। यह पुरुष के शुक्र/वीर्य को हरती है, खींच कर अपने में समाहित करती है, आकर्षित करती है। पुरुष का वीर्य हिरण्य वा मूल्यवान वस्तु है। यह स्त्री द्वारा खींचा जाता है, स्त्री की योनि की ओर स्वतः आकर्षित होता है। इसलिये यह हरिण्य है। स्त्री हिरण्यगर्भा है। पुरुष हिरण्यगर्भ है। दोनों के योग से प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं। ये दोनों प्रजापति हैं। प्रजनन स्थान सप्तम है। इसके लिये दोनों को क्या करना चाहिये ? ऋषि कहता है...  'अथ यद्युदक आत्मानं परिपश्येत् तदभिमन्त्रयेत मयि तेज:  इन्द्रियं यशो द्रविणं सुकृतमिति श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मान्मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमन्त्रयेत ।' (-बृहदारण्यक् उप. ६।४।६ ) अथ = और। यदि = जो ।उदक (उद् + अक) = वीर्य [सामान्यतः उदक को जल कहते हैं। अक् गतौ धातु से निष्पन्न होने के कारण उदक का अर्थ है-श्रेष्ठ वा तीव्र गति वाला। आकाश से गिरने वाले ...

वास्तुवेदनम्

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#वास्तुवेदनम्०४  वास्तु को उत्पत्ति के सन्दर्भ में मत्स्य पुराण की एक कथा है। प्राचीन काल में भगवान शंकर ने अन्धकासुर का वध किया। उस समय उनके ललाट से पसीने की कुछ बूँदें पृथ्वी पर गिरी। उससे एक विकराल पुरुष प्रकट हुआ। उसने अन्धकों के रक्त का पान किया। इससे उसकी तृप्ति नहीं हुई तो वह शिव के सम्मुख तपस्या करने लगा। तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे सर्वमासी होने का वर दिया। इस से वह तीनों लोकों को प्रसने लगा। सब को खाता हुआ वह पृथ्वी पर औधे मुंह गिर पड़ा। देवता, दानव, दैत्य, राक्षस आदि सभी लोग उसके विभिन्न अंगों को पकड़ कर उसे स्तम्भित कर दिये । वह पुनः उठ नहीं पाया। उस समय जिसने जहाँ पर उसे आक्रान्त कर रखा था, वह वहीं निवास करने लगा। इस प्रकार सभी देवताओं के निवास करने से वह वास्तु नाम से विख्यात हुआ तब उस दबे हुए प्राणी वास्तु ने सभी देवताओं से निवेदन किया कि दबे मुख होने से मैं भोजन नहीं कर सकता, आप लोग मुझे भोजन करायें। देवों ने कहा 'वास्तु के प्रसंग में तथा वैश्वदेव के अन्त में जो बलि दी जायेगी. वह निश्चय ही तुम्हारा आहार होगी। वास्तु शांति के लिये जो यज्ञ होगा, वह भ...

वैदिक ज्योतिष।

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#वैदिक_ज्योतिष_प्रवचन_संख्या८५  सप्तम भाव हिरण्यम् है। हिरण्य का अर्थ है सोना, सोने का पात्र, वीर्य, जिसका हरण किया जाय वा जो हरण करे, मूल्यवान् वस्तु स्त्री की योनि हरिण्यम् अर्थात् स्वर्णपात्र है। यह पुरुष के शुक्र/वीर्य को हरती है, खींच कर अपने में समाहित करती है, आकर्षित करती है। पुरुष का वीर्य हिरण्य वा मूल्यवान वस्तु है। यह स्त्री द्वारा खींचा जाता है, स्त्री की योनि की ओर स्वतः आकर्षित होता है। इसलिये यह हरिण्य है। स्त्री हिरण्यगर्भा है। पुरुष हिरण्यगर्भ है। दोनों के योग से प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं। ये दोनों प्रजापति हैं। प्रजनन स्थान सप्तम है। इसके लिये दोनों को क्या करना चाहिये ? ऋषि कहता है...  'अथ यद्युदक आत्मानं परिपश्येत् तदभिमन्त्रयेत मयि तेज:  इन्द्रियं यशो द्रविणं सुकृतमिति श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मान्मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमन्त्रयेत ।' (-बृहदारण्यक् उप. ६।४।६ ) अथ = और। यदि = जो ।उदक (उद् + अक) = वीर्य [सामान्यतः उदक को जल कहते हैं। अक् गतौ धातु से निष्पन्न होने के कारण उदक का अर्थ है-श्रेष्ठ वा तीव्र गति वाला। आकाश से गिरने वाले ...

वेद मे गर्भका वर्णन

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मैने सूर्य के १०८ नामों से हवन किया। पूर्वकाल में भगवान् कृष्ण ने इन १०८ नामों से सूर्य का स्तवन किया था। सूर्य को नमस्कार करने से ऐहिक एवं स्वर्गीय सभी लाभ निश्चित रूप से प्राप्त होते हैं। अतः हम प्रतिदिन सूर्य को क्यों न नमन करें ?  आदित्य, भास्कर, भानु, रवि, सूर्य, दिवाकर, प्रभाकर, दिवानाय तपन, वचनानांश्रेष्ठ, वरेण्य, वरद, विष्णु अना, वासवानुज, बल, वीर्य, सहस्रांश सहस्रकिरणद्युति, मयूखमाली, विश्व, मार्तण्ड, चण्डकिरण, सदागति भास्वान्, सप्ताश्व, सुखोदय, देवदेव, अहिर्बुध्य, धामनिधि, अनुत्तम, तप, ब्रह्ममयालोक, लोकपाल, अपाम्पति, जगत्यबोधक, देव, जगद्वीप, जगत्, अर्क, निश्रेयस पर, कारण, श्रेयसापर, इन प्रभावी, पुण्य, पतंग, पतंगेश्वर मनोवाञ्छितदाता दृश्फलप्रद अदृष्टफलमद, मह, महकर, हंस, हरिदश्य, हुताशन, मंगल्य, मंगल, मेध्य, ध्रुव, धर्मप्रबोधन, भव, सम्भावित, भाव, भूतभव्य, भवात्मक, दुर्गम, दुर्गविहार, हरनेत्र, श्यीमय, त्रैलोक्यतिलक तीर्थ, तरणि, सर्वतोमुख, तेजोराशि, सुनिर्वाण, विश्वेश, शाश्वत, धाम, कल्प, कल्पानल, काल, कालचक्र, क्रतुप्रिय, भूषण, मरुत्, सूर्य, मणिरत्न, सुलोचन, त्वष्टा, विष्टर, ...