वास्तुवेदनम्

#वास्तुवेदनम्०४ 

वास्तु को उत्पत्ति के सन्दर्भ में मत्स्य पुराण की एक कथा है। प्राचीन काल में भगवान शंकर ने अन्धकासुर का वध किया। उस समय उनके ललाट से पसीने की कुछ बूँदें पृथ्वी पर गिरी। उससे एक विकराल पुरुष प्रकट हुआ। उसने अन्धकों के रक्त का पान किया। इससे उसकी तृप्ति नहीं हुई तो वह शिव के सम्मुख तपस्या करने लगा। तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे सर्वमासी होने का वर दिया। इस से वह तीनों लोकों को प्रसने लगा। सब को खाता हुआ वह पृथ्वी पर औधे मुंह गिर पड़ा। देवता, दानव, दैत्य, राक्षस आदि सभी लोग उसके विभिन्न अंगों को पकड़ कर उसे स्तम्भित कर दिये । वह पुनः उठ नहीं पाया। उस समय जिसने जहाँ पर उसे आक्रान्त कर रखा था, वह वहीं निवास करने लगा। इस प्रकार सभी देवताओं के निवास करने से वह वास्तु नाम से विख्यात हुआ तब उस दबे हुए प्राणी वास्तु ने सभी देवताओं से निवेदन किया कि दबे मुख होने से मैं भोजन नहीं कर सकता, आप लोग मुझे भोजन करायें। देवों ने कहा 'वास्तु के प्रसंग में तथा वैश्वदेव के अन्त में जो बलि दी जायेगी. वह निश्चय ही तुम्हारा आहार होगी। वास्तु शांति के लिये जो यज्ञ होगा, वह भी तुम्हें आहार के रूप में प्राप्त होगा। यज्ञोत्सव में दी गई बलि भी तुम्हें आहार रूप में प्राप्त होगी। वास्तु पूजा न करने वाले भी तुम्हारे आहार होंगे। अज्ञान से किया गया यज्ञ भी तुम्हें आहार रूप में प्राप्त होगा। " ऐसा कहे जाने पर वह वास्तु नामक प्राणी प्रसन्न हो गया। इसी कारण तब से शांति के लिये वास्तुयज्ञ का प्रवर्तन हुआ। इस कथा से निष्कर्ष निकलता है-वास्तु का जन्म शिव से हुआ। अन्धकासुर= पृथ्वी पर फैला अंधेरा वा - अज्ञान शिव = सूर्य। शिव के ललाट से गिरा पसीना = सूर्य मण्डल से निकल कर पृथ्वी पर पड़ती किरणें जो तीनों लोकों के अन्धकारों का भक्षण करती हैं। सूर्य के प्रकाश में दिखने वाली शक्तियाँ= देवता। सूर्य का प्रकाश पूर्व ईशान दिशा से आता है। इस लिये वास्तु-भूमि में ईशान दिशा को वास्तु पुरुष का सिर कहा गया है। वास्तु पुरुष के अंगों को दबा कर रखने वाले वास्तु पुरुष के शरीर में वास करने वाले देवताओं की संख्या ४५ बताई गई है। इन के नाम है-

【१- शिखी।२- पर्जन्य। ३- जयन्त । ४- इन्द्र । ५- सूर्य ।६- सत्य। ७- भृश। ८- अन्तरिक्ष । ९- अनिल । १०- पूषा। ११ वितथ ।१२- बृहत्क्षत। १३ यम ।१४- गन्धर्व। १५- भृंगराज। १६ मृग । १७- पितर। १८- दौवारिक ।१९- सुमीव। २० पुष्पदन्त । २१- वरुण। २२- असुर ।२३- शेष। २४- पापयक्ष्मा । २५-रोग । २६- नाग। २७- मुख्य २८- भल्लाट। २९- सोम ।२०- भुजग। ३१- अदिति। ३२- दिति । ३३- आप । ३४- सावित्र । ३५- जय । ३६ रुद्र ३७ अर्थमा ३८- सविता । ३९- विवस्वान् । ४० कन्दर्प । ४१ मित्र ४२- राजयक्ष्मा ४३- पृथ्वीधर । ४४- आपवत्स । ४५- ब्रह्मा ।।】

इसके अतिरिक्त ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैर्ऋत्य, पश्चिम, वायव्य उत्तर दिशाओं में क्रमशः नरको स्कन्द, विदारी, अर्थमा, पूतना, जम्बुक, पापराक्षसी, पिलिपिच्छ देवों का वास होता है।

प्रसाद के निर्माण में ६४ पदों वाले वास्तुपुरुष का चिन्तन किया जाता है। गृहनिर्माण में ८१ पदों वाले तथा देवमन्दिर के निर्माण १०० पदों वाले वास्तु पुरुष का पूजन किया जाता है। यहाँ ८१ पदों वाले वास्तुचक्र का चित्रण हम कर रहे हैं। 【♂चित्र नीचें संलग्न है】

अधोमुख पड़े हुए वास्तु पुरुष का सिर ईशान कोण के शिखी कोष्ठ में है। उस का बायाँ नेत्र दिति स्थान में तथा दायाँ नेत्र पर्जन्य में स्थित है। मुख आप में है। बायाँ कान अदिति में तथा दायाँ कान जयन्त में पड़ा है। बायाँ कन्या भुजग में तथा दायाँ कन्था इन्द्र भाग में पड़ा है। वास्तु पुरुष की भुजाएँ बहुत लम्बी हैं। बायी भुजा सोम भल्लाद, मुख्य, नाग एवं रोग स्थान में पड़ी है। उसकी दायी भुजा सूर्य, सत्य, भृश अन्तरिक्ष तथा अनिल में स्थित है। उस वास्तु पुरुष का वाय मणिबन्ध पापयक्ष्मा में तथा दायाँ मणिबन्ध पूषा कोष्ठ में है। उसका दायाँ हाथ रुद्र तथा राजयक्ष्मा में है। दायाँ हाथ सावित्र एवं सविता में स्थित है। उसकी छाती आपवत्स में है। बायाँ स्तन पृथ्वीघर में तथा दायाँ स्तन अर्थमा में है। हृदय ब्रह्मा में है। वाम कुक्षि मित्र में तथा दक्षिण कुक्षि विवस्वान् में है। उसका वामपार्श्व शेष, असुर स्थान में है। उसका दक्षिण पार्श्व वितय तथा बृहत्क्षत में है। उसका वापोरु वरुण में तथा दक्षिणोरु यम में है। उसका वायाँ घुटना पुष्पदन्त में तथा दायाँ घुटना गन्धर्व भाग में पड़ा है। वास्तु पुरुष का बायाँ जंघा (घुटने से नीचे का भाग) सुग्रीव कोष्ठ में है। उसका दायाँ जंघा भृंगराज भाग में है। वास्तु पुरुष का लिंग कन्दर्प एवं जय स्थान में निहित है। उसका बायाँ नितम्ब दौवारिक तथा दायाँ नितम्ब मृग में है। उसके दोनों चरण पितर स्थान में हैं।

सिर (शिखी), मुख (आप), हृदय (ब्रह्मा), दोनों स्तन (पृथ्वीधर, अर्यमा), लिंग (कन्दर्प, जय)- ये वास्तु पुरुष के मर्मस्थान हैं। बीच के नव कोष्ठक ब्रह्मा के हैं। अतएव १५ कोष्ठ संवेदनशील हैं। हृदय के चारों ओर के आठों कोष्ठ तथा हृदय से ९ अतिमर्मस्थान हैं।

इसलिये पर बनाते समय उपलब्ध भूखण्ड के ८१ भाग कर के बाहर के ३२ भागा का सर्वथा त्याग कर देना चाहिये। अर्थात् भूखण्ड की चाहार दीवारी के अन्दर इतना स्थान रिक्त रहना चाहिये। अब वास्तुचक्र का यह रूप होगा।

यह ७ x ७ = ४९ कोष्ठकों वाला निर्माण्य वास्तु चक्र है जिसके चतुर्दिक रिक्त स्थान युक्त चाहार दीवारी है।

 आप (मुख) स्थान में स्वाध्याय कक्ष, आपवत्स (छाती) स्थान में स्नान कक्ष, कन्दर्प (लिंग) स्थान में मैथुन कक्ष, जय (लिंग) स्थान में शौचालय, सावित्र (हाथ) स्थान में ज्योति वा अग्निशाला, सविता (हाथ) स्थान में पाकशाला, विवस्वान् (पेट) स्थान में भोजनालय, मित्र (पेट) स्थान में औषधिशाला, रुद्र (हाथ) स्थान में अन्नागार, राजयक्ष्मा (हाथ) स्थान में कूटने, पीसने, दरने, चालने के लिये कार्यशाला पृथ्वीधर (स्तन) स्थान में दुध, दही, घी के भाण्ड रखने के लिये रसशाला, अर्थमा (स्तन) स्थान में प्रसवशाला रखना अधिक समीचीन है। ब्रह्मा (हृदय) स्थान तो पूर्णतः रिक्त रखना चाहिये। शेष स्थानों पर यथोचित निर्माण करा कर उपयोग में लाना चाहिये।

वास्तुपुरुष वस्तुतः वास्तु में निहित शक्ति का नाम है। यह वास्तु विज्ञान है। वास्तु पुरुष के अंगों को बचाते हुए निर्माण करना किसी भी जातक के लिये कठिन कार्य है। निर्दोष वास्तु स्थापित करना असम्भव है। व्यक्ति दुःख शोक रोग चिन्ता आदि से कभी मुक्त नहीं हो सकता। उसका प्रारब्ध गुप्त रूप से उसका पीछा करता रहता है। यह प्रारब्ध अपने अनुसार व्यक्ति से उसके लिये वास्तु प्रतिष्ठा करायेगा। जिसके घर में आँगन नहीं होता ब्रह्मा (हृदय) स्थान की अवहेलना कर वहाँ निर्माण कराया जाता है, वहाँ सुख शांति सुमति सुव्यवस्था मात्र एक स्वप्न है। आज लोगों के दुःख का बड़ा कारण उनका सदोष वास्तु है। वास्तुपुरुषाय नमः।

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