अंतर्जातीय विवाह

अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाहों के आधार पर जातियों की उत्पत्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन सबसे पहले बौधायन ने किया। उन्होंने चांडाल, रथकार, वेण, निषाद, पुक्कुस आदि जातियों का उल्लेख किया है। बौद्ध ग्रन्थों में इन्हें हीन जाति कहा गया है। मेगस्थनीज ने भारतीय जनता के सात जातियों में विभाजित होने तथा अपनी ही जाति में विवाह करने का उल्लेख किया है। यद्यपि मनुस्मृति के अध्ययन से पता चलता है कि अनुलोम विवाहों की अनुमति थी। मनु ने अंबष्ठ, निषाद, सूत, उग्र, विदेह, मागघ आदि 57 जातियों का उल्लेख किया है उसके अनुसार इन सभी जातियों की उत्पत्ति अन्तरजातीय विवाहों के फलस्वरूप हुई। इसी बात को महाभारत ने भी प्रमाणित किया है। भीष्म के अनुसार प्रतिलोम विवाहों के फलस्वरूप ही नई जातियां उत्पन्न हुई।

परन्तु अन्तरजातीय विवाहों से जातियों की उत्पत्ति का सिद्धान्त धर्मशास्त्रकारों की कल्पना लगती है क्योंकि हम देख चुके हैं कि कुछ जातियां व्यवसाय के आधार पर, कुछ प्रजाति के आधार पर तथा कुछ जातियाँ क्षेत्र के आधार पर बनी एक ही जाति की उत्पत्ति के विषय में धर्मशास्त्रकार अलग-अलग मत भी रखते हैं जैसे कुछ जातियों का विवरण इस प्रकार हैं-

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