जातक के भाग्य का स्वरूप द्विविध

जातक के भाग्य का स्वरूप द्विविध है। रेखागणितीय दृष्टि से यह त्रिकोणीय एवं चतुष्कोणीय है। भाग्यस्थान नवम है। नवम से नवम स्थान पञ्चम है। इसलिये यह पश्चम स्थान भाग्य का भाग्य हुआ। पञ्चम स्थान से नवम स्थान लग्न है। इसलिये यह लग्न पञ्चम का भाग्य हुआ। इससे स्पष्ट हो जाता है...

 १. भाग्य = नवम स्थान ।
 २. भाग्य का भाग्य पश्चम स्थान । 
३. भाग्य के भाग्य का भाग्य लग्न व प्रथम स्थान ।

 प्रकारान्तरतः हम कह सकते हैं...
१. नवम स्थान = भाग्य । 
२. पञ्चम स्थान = भाग्य का बीज ।
 ३. लग्न स्थान = भाग्य के बीज का बीज । 

इस प्रकार नवम स्थान स्थूल भाग्य है जबकि पञ्चम स्थान सूक्ष्म तथा प्रथम स्थान सूक्ष्मतर भाग्य है। जातकों का सूक्ष्मतम भाग्य ज्योतिष के फलित ज्ञान से परे है। इसे कोई नहीं बता सकता। अतः यह अनिर्वचनीय है। इसलिये यह परमात्मा है। इस वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि नवम से महत्वपूर्ण पञ्चम है और पञ्चम से अधिक महत्वपूर्ण प्रथम स्थान है। यही कारण है कि लग्न को वरीयता दी जाती है। हर कार्य में लग्न शुद्धि पर ध्यान दिया जाता है। लग्न ठीक नहीं तो कुछ भी ठीक नहीं। प्रथम स्थान लग्न है। लग्न शरीर (आत्मा) है। शरीर का ही भाग्य होता है। शरीर नहीं तो भाग्य किसका?

 पश्चम स्थान बुद्धि है। बुद्धि भी मस्तिष्क में होती है। मस्तिष्क शरीर का भाग है। अतः शरीर सर्वोपरि है इसलिये आरोग्य सबसे बड़ा है। महत्व के क्रम से ये तीन भाग्य स्थान सदा विचारणीय है...
 १. लग्न स्थान ।
 २. पञ्चम स्थान ।
३. नवम स्थान ।

 इस भाग्य को जो जाने, वही भाग्यविद् है। ऐसे भाग्यविद् को मेरा नमस्कार । 

अब मैं भाग्य के चतुष्कोणीय स्वरूप पर दृष्टि डालता हूँ।

१,५,७,९ स्थानों से एक चतुष्कोण बनता है। यह त्रिभुजाकार चतुष्कोण मनुष्य के भाग्य का दर्पण है। इस दर्पण के सामने आने पर भाग्य प्रतिबिम्बित होता है। इस चतुर्भुज में लग्न (१) न्यून कोण, पंचम (५) न्यूनकोण, नवम (९) न्यूनकोण है किन्तु सप्तम (७) न्यूनकोण न होकर बृहत्कोण है (न्यून कोण ९०° से कम। बृहत् कोण = १८०° से अधिक)। इन चारों कोणों का योग ३६०° होता है।

किस भाव का कितना मूल्य है ? इसे इस भाग्यायतन से जाना जाता है। 

प्रथम भाव = ६०° । 
पञ्चम भाव = ३०°
 नवम भाव = ३०° ।
 सप्तम भाव २४०°। 

इन चारों कोणों का योग = ६० + ३० +३०+ २४० = ३६०° । = चार समकोण (९० X ४) । यहाँ, सुत भाव धर्म भाव = ३०° ।

सुत भाव धर्म भाव = लग्न भाव = ६०° ।

 सुत भाव + धर्म भाव + देह भाव = ३०° + ३०°+ ६०° = १२०° । 

सप्तम भोग भाव = २४०°। = १२०° x २ । =सुत + धर्म + देह के अंशों का दो गुना ।

इस गणितीय दृष्टि से सिद्ध हुआ कि सप्तम भाव सर्वोपरि है। इस भाव का महत्व १,५९ के महत्व का दुगुना है। यह प्रत्यक्ष सिद्ध है। इसे कौन झूठा कर सकता है ? इस लौकिक जीवन में स्त्री को पुरुष का सान्निध्य न मिले अथवा, पुरुष को स्त्री का सहवास न मिले तो भाग्य कैसा ? इसका अर्थ यह नहीं है कि विवाह होना (स्त्री को पुरुष की प्राप्ति, पुरुष को स्त्री की लब्धि) भाग्य है। स्त्री को पाकर पुरुष तृत्प हो, तनाव रहित हो, चिन्ता मुक्त हो तथा पुरुष को पाकर स्त्री धन्य हो, तुष्ट हो, आह्लादित हो तो उनके लिये यह भाग्य है।

 सप्तम भाव, भाग्य का बीज है, खेत है, फसल (उत्पादन) है। जिसका यह ठीक नहीं, उसको भाग्यवन्त कैसे कहा जाय ? लग्न के ठीक नीचे वा सामने सप्तम भाव है। पापग्रस्त होने पर यह सबसे पहले लग्न को बिगाड़ता है। लग्न के बिगड़ने पर पश्चम एवं नवम महत्वहीन हो जाते हैं। इस बिगड़ी को बनाने वाला देव मेरे सम्मुख मुस्करा रहा है। नित्य इसको प्रणाम करता हूँ। यह देव सुन्दर है, योगियों का चित्त इसमें रमण करता है, यह सब के भीतर रमण करता है, यह रम्य है। इसलिये इसे राम कहा जाता है। यह सतत स्मरण करने वाले जीवों के समस्त पापों को हर लेता है, न स्मरण करने वालों की सम्पत्तियाँ हर लेता है। इससे इसे हरि कहा जाता है। सभी प्राणी अनायास इसकी ओर खिंच रहे हैं, यह सबको अपने में आत्मसात करने के लिये खींच रहा है, यह बहुत ही सुन्दर (कृष्ट) है। इसलिये इसे कृष्ण कहा जाता है। यह देव अग्नि के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इन विशेषताओं के कारण अग्नि के तीन नाम हैं-हरि, राम, कृष्ण ।

 सातों विभक्तियों से परे 'सम्बोधन' होता है। हरे! सम्बोधन से हिरण्यगर्भा अग्नि का प्राकटय होता है है। राम ! सम्बोधन से रश्मिवान् सूर्य का उदय होता है। कृष्ण । सम्बोधन से कालाग्नि के अभय स्पर्श की सुखद अनुभूति होती है। अतः बिगड़ी को बनाने के लिये, दुर्भाग्य को सौभागय में बदलने के लिये अग्नि के त्रिनामात्मक (राम, कृष्ण, हरि) सम्बोन मन्त्र का गान करना चाहिये। मन्त्र है...

'हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।
 हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।।'
(महामंत्र, कलिसंतरणोपनिषद् )

 कलि का अर्थ है-लड़ाई झगड़ा असहमति, मतभेद, उथल-पुथल, अशांति यह कलियुग है। युगधर्म से कोई बच्चा नहीं है। कलिमस्त जीवों के उद्धार का साधन यह त्रिपाल महामन्त्र है। यह अग्निमन्त्र है। इससे कलि का कूड़ा कर्कट जल कर भस्म हो जाता है। यह पाप ताप नाशक है। यह शांतिदायक है। यह भाग्यगुरु है। इसे मेरा प्रणाम ।

 संसार में यह देखा जाता है-धन है, बल है, घर है, बुद्धि है, धर्म-कर्म है, आय है, ठाट बाट पर व्यय हो रहा है, सन्तान है, स्त्री है। इतना सब होते हुए दाम्पत्यक्लेश है। जिसकी स्त्री लठैत हो गई, उस पुरुष को भाग्यशाली कहने में मुझे संकोच हो रहा है। स्त्री को लठैत (लड़ाकू) बनाने वाला पुरुष ही है। स्त्री और पुरुष में जब भी युद्ध होगा, उसमें स्त्री की जीत एवं पुरुष की हार निश्चित है। सूर्य पूर्व दिशा में उदित न होकर पश्चिम में उगे और पूर्व में अस्त हो, यह सम्भव है। परन्तु स्त्री-पुरुष के संग्राम में पुरुष जीते और स्त्री हारे, यह असंभव है। यह मैं सत्य कहता हूँ। इस कथन में प्रमाण है...

 १. स्त्री महिषासुर मर्दिनी देवी हैं। स्त्री रक्तबीज नाशिनी देवी है। वो शुम्भनिशुम्भ घातिनी देवी है। सभी देवता इस देवी की शरण में जाते हैं। वे देव अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर पाते और असुरों से लात खाते हैं तो यही देवी उन्हें बचाती है, असुरों को मारती है। दुर्दान्त राक्षस दैत्य दानव सबको हरा देते हैं पर, एक स्त्री / देवी से हार जाते हैं। जो पुरुष, स्त्री से बढ़कर अपने को समझता है अथवा जिस पुरुष में स्त्री के प्रतिहीन भाव होता है, वह अज्ञानी है और दुर्दशा को प्राप्त होता है। अबला नाम से ख्यात यह स्त्री सबला है। जो यह जानता है, वह ज्ञानी है।

 २. स्त्री कारण है। पुरुष कार्य है। स्त्री से पुरुष है, पुरुष से स्त्री नहीं क्योंकि पुरुष के गर्भ में स्त्री नहीं होती, स्त्री के गर्भ में पुरुष का जन्म होता है। स्त्री ही पुरुष को धारण करती है। स्त्री अपने स्तन से दूध पिला कर पुरुष का पालन करती है। अतः स्त्री बड़ी है और पुरुष उससे हीन है। कारण अपने कार्य से बड़ा होता है। कारण रूप स्त्री अपने कार्य पुरुष से बड़ी है। 

३. स्त्री शब्द दीर्घान्त है, पुरुष हस्वान्त नर शब्द के दोनों वर्ण ह्रस्व हैं, नारी के दोनों वर्ण दीर्घ । ह्रस्व और दीर्घ के न्याय से स्त्रीवाचक शब्द बड़े हैं पुरुषवाचक शब्दों से उदाहरणार्थ- राम हस्व, सीता दीर्घ कृष्ण हस्व, राधा दीर्घ शिव हस्व, गौरी दीर्घ नारायण ह्रस्व, नारायणी दीर्घ अतः स्त्री के समक्ष पुरुष तुच्छ है। 

४. पुरुष तत्व चेतन एवं अधिकारी है। यह यथावत बना रहता है। स्त्री तत्व जड़ है, बिकारी है। यह अपना विस्तार करती है। यह एक से अनेक होती है। सांख्य शास्त्र के २५ तत्वों में से १ तत्व पुरुष है तो २४ तत्व स्त्री के/से हैं। इसलिये स्त्री बड़ी हुई पुरुष से।

 ५. प्राकृतिक कुण्डली में लग्न १ = पुरुष तथा सप्तम भाव = ७ स्त्री। इससे सिद्ध हुआ कि स्त्री तत्व ७ गुना अधिक भारी है पुरुष तत्व से। अतः स्त्री बड़ी है, पुरुष से।

६. कुण्डली में प्रथम भाव ऊपर है, सप्तम भाव नीचे है। इसका अर्थ हुआ पुरुष ऊपर है स्त्री के। अर्थात् पुरुष का आसन स्त्री है या स्त्री को नीचे कर उसे अपना आधार बना कर पुरुष उस पर आश्रित / आरूढ़ है। यदि यह आधार खिसक/ हट जाय तो वह (पुरुष) गर्त में गिर पड़े। पुरुष को गर्त में गिरने से बचाने वाली भार्यारूप में स्त्री ही है। इसलिये स्त्री बड़ी है पुरुष से। 

७. स्त्री के दो रूप हैं-जननी और जाया। पुरुष के दो रूप हैं-पति और पुत्र इन दोनों रूपों में स्त्री (जननी/जाया) पुरुष के भार को सुख पूर्वक वहन करती है। पुत्र रूप पुरुष, जननीरूप स्त्री के वक्षस्थल पर शिशु बन कर लेटता एवं स्तन पान करता है। पति रूप पुरुष, जाया रूप स्त्री के ऊपर सवार होकर मैथुन में प्रवृत होता है। स्त्री के द्वारा पुरुष को दिया गया यह सम्मान उसे बड़प्पन प्रदान करता है। जो है दूसरे को ऊंचा आसन/ सम्मान देता है, वह बड़ा है। यह सम्मान पाकर मूर्ख पुरुष अपने को स्त्री से बड़ा समझ बैठता है। यहाँ उसके पतन का हेतु है।

अब तक के विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री पुरुष से बड़ी है, भारी है। सप्तम स्त्री भाव नोचे है, प्रथम पुरुष भाव ऊपर है। जल में पत्थर भारी होने से नीचे चला जाता है तथा काष्ठ तृणादि हल्के होने से पानी में ऊपर रह जाते/ तैरते रहते हैं। पुरुष का ऊपर होना उसका हल्कापन है। स्त्री का नीचे होना उसका भारीपन है। जो नीचे/ अप्रकट है, वह गूढ़ तत्व स्त्री है जो ऊपर/प्रकट है, वह पुरुष तत्व निश्चय हो स्त्री से लघु है।

 जो स्त्री दाम्पत्य जीवन में पुरुष के लिये फूलों की शय्या होती है, वही आगे चल कर काँटों की सेज बन जाती है। जो पुरुष घर के भीतर स्त्री के साथ रतियुद्ध करता है, वही घर के बाहर उससे पिण्ड छुड़ाने के लिये तड़पता छटपटाता और घमासान मारामारी करता है। स्त्री से पुरुष न तो शय्या युद्ध में जीतता है। और न सामाजिक समर में। वो अपने प्राणों से खेलती है, पुरुष अपना प्राण बचाता है। स्त्री हार कर भी जीतती है, पुरुष जीत कर हारता है। पुरुष के अन्दर श्रेष्ठत्व का अहं उसे खा जाता है। स्त्री से वही पुरुष नहीं हारता जो पुनः स्त्री की कामना नहीं करता। जो अपने भीतर के स्त्री भाव को विकसित कर स्वयं स्त्री हो जाता है, वह स्त्री से कैसे हार सकता है?

 स्त्री = कोमल भावना ।पुरुष = कठोर भाव। जब तक स्त्री स्वयं में स्त्री रहती है वह देवी है। वही स्त्री जब पुरुषत्व के आवेश से युक्त होती है तो राक्षसी होती है। पुरुष जब स्त्रीत्व के भाव में होता है तो देवता होता है। ऐसे पुरुष को स्त्री नहीं हरा सकती। स्त्री का सामना पुरुष को स्त्री बन कर ही करना चाहिये। स्त्रीगुणों से युक्त पुरुष भक्त बनता है। भक्ति = समर्पण। कबीर कहते हैं-'हरि मेरो पीव मैं तो राम की बहुरिया । परमात्मा के सामने स्त्री बनना ही भक्ति है। प्रपत्ति हो स्त्रीत्व है। जिस स्त्री में पुरुष के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव नहीं है तथा जिस पुरुष में स्त्री के आत्मसमर्पण को पाने की शक्ति नहीं है, • वहाँ कलियुग का ताण्डव अहर्निश होता है। ऐसे दाम्पत्य को धिक्कार है। स्वार्थ, अविश्वास, असहिष्णुता, . दम्भ, पाखण्ड एवं नास्तिकता के कारण दाम्पत्य जीवन में नरक का प्रादुर्भाव होता है। इस नरक में पड़े धक्के खाते लोगों को मैं नमन करता हूँ और अपने राम में रमण करता हूँ।

 जिस जातक के १, ५, ७, ९ भाव सर्वशुद्ध हों वह महाभाग्यशाली है। ऐसा जातक असाधारण कोटि का होता है। ऐसे जातक को भगवान् कहा जाता है। श्रीकृष्ण की कुण्डली ऐसी ही है। यहाँ लग्न में उच्च का चन्द्रमा एवं राहु, पञ्चम में उच्च का बुध, सप्तम में उच्च का केतु, नवम में उच्च का मंगल है। ये चारों भाव भाग्यायतन हैं, हर प्रकार से शुभ प्रभाव में हैं। इन पर तनिक भी पाप प्रभाव नहीं है।

 १. लग्न में दो उच्च के ग्रह राहु एवं चन्द्र के होने से कृष्ण महाबली हुए। बाहुबल तृतीय का स्वामी चन्द्रमा लग्न में उच्च का है। राहु के बल का कोई थाह ही नहीं है।

 २. पचन में पचमेश एवं धनेश बुध उच्च का होकर बैठा है। इसे स्वगृही गुरु अपनी सजम पूर्ण दृष्टि से देख रहा है। यही कारण है कि श्री कृष्ण अनेक पुत्रों के पिता हुए। 

३. सप्तम में उच्च का केतु एक अतिशुभ ग्रह है। इस केतु को बृहस्पति अपनी नवम मित्रदृष्टि से देख रहा है। भाग्येश एवं केन्द्रेश शनि शुभ प्रभाव वाला होकर केतु को अपनी दशम दृष्टि से झाँक रहा है। इस प्रकार सप्तम भाव बहुत ही बली एवं शुभ हुआ। यही कारण है कि कृष्ण के जीवन में अनेक स्त्रिय भोगने को मिली।

 ४. नवम में उच्च का मंगल होने से कृष्ण ने धर्मयुद्ध किया। 'परित्राणाय साधूनां विनाशय च दुष्कृताम्'- यही श्री कृष्ण की प्रतिज्ञा है। वेद का एक मन्त्र है- 'पश्येम शरदः शतम्।' (अथर्ववेद १९ । ६७ । १)

 इस मन्त्र का प्राण है, शरदः। शर= अन्धकार को नष्ट करने वाला अर्थात् प्रकाश (शु हिंसायाम्) । शरदः = प्रकाश को देने वाला अर्थात् दिन इस मन्त्र में शरद का अर्थ है दिन। शतम् = अनेक मन्त्र का सरल अर्थ हुआ-हम अनेक दिनों को देखें। दिन में सूर्य के दर्शन होते हैं। प्रकाश देने वाला सूर्य है। सूर्य = प्रकाश = ज्ञान ।शर= जो अज्ञान का नाश करे। शरद = अज्ञान का नाश कर ज्ञान देने गुरु/ सूर्य शरदः शतम्= गुरु या सूर्य के अनेकों रूप ज्ञान की विभिन्न विधाएँ, शाखा प्रशाखाएँ अर्थात् सम्पूर्ण ज्ञान अब मन्त्र का अर्थ हुआ-हम सम्पूर्ण ज्ञान का साक्षात्कार करें, ज्ञानी हों जो ज्ञानी है, वही भाग्यशाली है। इस बात को विभिन्न प्रकार से मंत्रबद्ध किया गया है...

 'जीवेम शरदः शतम् ।'( अथर्व १९ । ६७ । २ )
(हम ज्ञानमय जीवन जिये) । 

'बुध्येम शरदः शतम् ।'
( अथर्व १९।६७।३ )
(हम ज्ञान को बुद्धि में पचा लें)।

 'रोहेम शरदः शतम्।'(अथर्व १९ । ६७ । ४ )

(हम ज्ञान की सीढ़ियों से / पर चढ़े।

 "पूषेम शरदः शतम् ।"( अथर्व १९ । ६७ । ५ )
(हम ज्ञान से अपने स्वरूप का पोषण करें।

 'भवेम शरदः शतम् ।'(अथर्व १९ । ६७ । ६)
(हम सम्पूर्ण ज्ञान के विग्रह होवें)।

 'भूयेम शरदः शतम्।' (अथर्व १९ । ६७ । ७ )
(हम ज्ञान से सत्तावान् होवें)। 
'भूयसी: शरदः शतम्।'( अथर्व १९ । ६७ । ८ )
(हम ज्ञान से विस्तार को प्राप्त होवें)।

अथर्ववेद के इस सूक्त में ज्ञान की चाहना की गई है। ज्ञान से विश्वत्व मिलता है। ज्ञानी विष्णु होता है। ज्ञान अनन्त भुजाओं, चरणों, शीर्षो, नेत्रों वाला है। मनुष्य देह पाकर यह ज्ञान नहीं मिला तो जन्म व्यर्थ है, ऐसा समझना चाहिये। भाग्य का चरम बिन्दु है ज्ञान इस ज्ञान से वंचित स्त्री पुरुष हाहाकार करते हुए जीवन जी रहे हैं, नरक में स्वर्ग को ढूंढ रहे हैं, स्वर्ग को नरक समझ कर उससे पराङ्मुख हो रहे हैं, पुरुष की लताड़ सहती हुई स्त्री पुनः उसी के पीछे भाग रही है किन्तु अपने भीतर बैठे राम की ओर देख भी नहीं रही है, स्त्री के द्वारा नचाया जाता हुआ पुरुष उसके मलायतन को सर्वस्व समझता है पर उस राम को नहीं भजता जो सर्वसुखों का सार है। 

पुरुष की गुरु स्त्री है। तुलसीदास जी की पत्नी रत्नावली ने अपने पति को फटकारा- 

'अस्थिवर्ममय देह मम तामे अवसी प्रीति । 
ऐसी यदि श्री राम में होती न भव भीति ।।' 

तुलसी ने यह उपदेश शिरोधार्य किया और सन्त ज्ञानी भक्त बने। ऐसी रत्नावली एवं ऐसे तुलसीदास को मैं बारम्बार नमन करता हूँ। वह स्त्री जो अपने पति को पतन के गर्त में गिरने से बचा ले तथा ऐसा पति जो अपनी पत्नी को पाप करने से रोक ले, धन्य होता है। जो धन्य है वही धनवान् भाग्यवान् है।

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