हाथ में समस्त पौरुष विद्यमान है। वेद वचन है और ज्योतिषशास्त्र।
भाग्य भवन जाँघ है भाग्य विधाता हाथ है। जांघ तक हाथ की पहुँच है। जाँच पर्यन्त जिसका हाथ पहुँचता है, वह अतिमानव महाभाग्यशाली है। ऐसा पुरुष आजानुभुज कहलाता है। मनुष्य जन्म पाना ही भाग्यवान् होना है। सम्पूर्ण जाँघ को ढकने वाला हाथ चक्रवर्ती सम्राट वा वीतरागयोगी का होता है। भाग्य भवन का निर्माण इन हाथों से होता है। इन हाथों को मेरा नमस्कार । दानी हाथों को मेरा बारम्बार नमस्कार !
हाथ में समस्त पौरुष विद्यमान है। वेद वचन है ...
"हस्ते दधानो नृम्णा विश्वान्यमे देवान् धाद, गुहा निषीदन् ।
विदन्तीमत्र नरो धियंधा हृदा यत् तष्टान् मन्त्री अशंसन् ॥"
( ऋग्वेद १ । ६७ । २)
हस्ते = हाथ में। दधानः = धारयन् = धारण करता हुआ। नृम्णा पौरुषाणि पौरुषों/बलों को। विश्वानि =सर्वाणि सबको। अमे= गति में, सेवा में, सम्मान में, शब्द (ज्ञान) में, स्वाद में, भोजन 1 में, रोग में, व्याधि में, कष्ट में, भय में। (अम् अमति भ्वा .पर. जाना, सेवा करना, सम्मान करना, शब्द करना, खाना, टूट पड़ना, आक्रमण करना, रोग से कष्ट होना, व्याधिमस्त होना, रोगी होना, भयभीत होना, कच्चा होना, अपक्व होना + घञ् = अम्)। देवान् = देवताओं को, दिव्य शक्तियों को। धात् = धारितवान् रक्खा गुहा गुहायाम् गुफा में (सप्तम्यलुक्। निषीदन् = बैठता हुआ।
विदन्ति = जानन्ति = जानते हैं। ईम् = एनम् इसको। अत्र = अस्याम् = इसमें। नरः = पुरुषाः = मनुष्य धियम्-धाः बुद्धीनां धारयितारः = बुद्धिमान् । हृदा हृदयेन = हृदय से यत्= यदा =जब। तष्टान् = निर्मितान् = रचे हुओं को मन्त्रान् = मन्त्रों को परामर्शोों को, उपायों को, युक्तियों को अशंसन् = स्तुतिरूपेणोच्चारयन्ति (लहथेलङ्) स्तुति रूप से उच्चारण करते हैं।
इस मन्त्र का देवता अग्नि मनुष्य के हाथ में रहता है। इससे हाथ गरम रहता है। गरम हाथ में शक्ति होती है। ठण्डा हाथ निर्बल होता है। जिस हाथ में अग्नि रहता है, वह वरेण्य है। ऐसे हाथ को मै प्रणाम करता हूँ।
मन्त्रार्थ = समस्त पौरुषों/ बलों/ शक्तियों / उद्योगों / प्रयत्नों को हाथ में धारण करते हुए, गुफा में (हाथ में लिखी खिची रेखाओं के नीचे बैठते हुए इस अग्नि ने) देवताओं / देवशक्तियों/ विद्वानों को भय में/ अपरिपक्वावस्था में / अज्ञान में / रक्खा। बुद्धिमान पुरुष जब हृदय से (भावपूर्वक) रचे हुए मन्त्रों को / विचारों को उच्चारण करते हैं, (सब) इस (गुफा) में (स्थित) इस (अग्नि) को जानते हैं, समझ पाते हैं।
व्याख्या= सूर्य का हाथ उसकी किरणें हैं। इन किरणों में उष्मा होती है। यही कारण है कि घनीभूत किरणें दाहक होती हैं। मनुष्य के हाथ (कर) में अग्नि का वास है। हाथ की समस्त (स्थूल, सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म) रेखाएँ इस अग्नि की किरणें ज्वालाएं हैं। इन्हें जानने वाला ज्योतिषी ही वास्तव में बुद्धिमान है। कर गुफा में बैठे हुए अग्निदेव को मैं प्रणाम करता हूँ। इस अग्नि की शक्ति से देवता घबड़ाते हैं। (पञ्चेन्द्रियाँ= पञ्चदेव तथा साहं बुद्धिमान मनुष्य= देव) समर्पण भाव से की गई प्रार्थना द्वारा अग्नि प्रसन्न होकर कृपा करते हैं तो ज्ञान होता है। ऐसे ज्ञानी ही हाथ की शक्ति को जानते हैं।
विशेष = हस्ते = हस्त (नक्षत्र) में, ऐसा मानकर विचार करता हूँ। राशि चक्र का तेरहवाँ नक्षत्र हस्त है। इसका स्वामी चन्द्रमा मन है। यह नक्षत्र पूर्णतः कन्याराशि के अन्तर्गत आता है। कन्या का स्वामी बुध - बुद्धि है। अतएव हस्त = मन + बुद्धि। हस्ते = मन सहित बुद्धि में वा, बुद्धि सहित मन में अथवा, मन और बुद्धि दोनों में अग्नि का वास मन और बुद्धि दोनों में है। मन और बुद्धि का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। इन दोनों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। मन = भाव, ज्ञान। बुद्धि = तर्क । मन और बुद्धि के बीच में विचार (मंगल अंगारक अग्नि) होता है। भाव ३ का कारक मंगल शक्ति/ बल है। भाव ४ का कारक चन्द्रमा है। भाव ५ का कारक बुध बुद्धि / तर्क है। भाव ६ का कारक शनि दुःख है। भाव ७ का कारक शुक्र सुख है। भाव ८ का कारक राहु मृत्यु है। भाव ९ का कारक केतु उत्कर्ष है। भाव १ का कारक सूर्य आत्मा है। भाव २ का कारक गुरु विद्या/ ज्ञान है। सात दृश्यग्रह अग्नि से आप्लावित हैं। हाथ में अग्नि का यह प्रवाह तीर रेखाओं से दिखाया गया है। १२ राशियों का राशि चक्र चारों अंगुलियों के पोरों में द्रष्टव्य है। इन सबमें अग्नि का प्रवाह है। अंगूठ के दोनों खण्ड दिन-रात हैं। इस होरा चक्र में अग्नि प्रवाहित होती रहती है। इस कर कुण्डली का ज्ञाता आग्निक है। ऐसे व्यक्ति को मेरा नमस्कार ! आग्न्येय हाथ में शस्त्र शोभा देता है। देवता शस्त्रधारी हैं। इसलिये पूज्य हैं। विष्णु के हाथ में सुदर्शन चक्र (कालचक्र), शिव के हाथ में त्रिशूल (त्रिगुणात्मक प्रकृतिचक्र), इन्द्र / सूर्य के हाथ में वज्र (कठोर रश्मि /अग्नि चक्र), यम के हाथ में दण्ड (कालदण्ड/ संयमन चक्र) ब्रह्मा के हाथ में कमण्डल (सृजन चक्र) है। जातक की अंगुलियों में ये सभी चक्र होते हैं। फलतः इनको धारण करने वाले देवता भी करस्थ माने गये हैं। करस्थ देवों को मेरा प्रणाम !
हाथ से सम्पूर्ण कार्य सम्पन्न होते हैं। अतः इसे विश्वकर्मा कहते हैं। गृहस्थाश्रम में प्रवेश के लिये। पाणिग्रहण संस्कार होता है। पाणिग्रहण = हाथ की अग्नि को ग्रहण करना, करस्थ देवों का पूजन / आदर करना, सहयोग करना, स्त्री के दो हाथों + पुरुष के दो हाथों का योग होकर चार हाथ वाला अर्थत् विष्णु होना। जो पुरुष किसी स्त्री का पाणिग्रहण नहीं करता अथवा जो स्त्री किसी पुरुष का पाणिग्रहण नहीं करती उन्हें चाहिये कि वे मूला प्रकृति/ परमेश्वर का पाणिग्रहण करें। भगवान् को अपना हाथ देना = भगवदाश्रय में रहना। इसी का नाम प्रपत्ति / शरणागति / भक्ति है। इसी में वास्तविक सुख है। अभय होने के लिये निश्चिन्त होने के लिये दिव्य पाणिग्रहण एकमात्र उपाय है। परमात्मा का हाथ पकड़ना तथा परमात्मा को अपना हाथ पकड़ा देना, एक क्रिया नहीं है। हाथ पकड़ने में चूक सम्भव है। हाथ टूट जाय तो ? किन्तु हाथ पकड़ाने में चूक सम्भव नहीं। परमात्मा जिसका हाथ पकड़ता है, उसे कभी छोड़ता नहीं। किन्तु जीव जब परमात्मा का हाथ पकड़ता है तो उसके छूटने की सम्भावना बनी रहती है। पकड़ने में निश्चिन्तता नहीं। पकड़ा देने में निश्चिन्तता रहती है। जो जातक भगवान् को अपना हाथ दे देता है, वही भाग्यवान् है। हाथ देना = सम्पूर्ण कर्मों (के फल) को अर्पित करना।
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