दशम का व्यय स्थान भाग्य है
दशम का व्यय स्थान भाग्य है। अथवा, भाग्यरूपी बीज से जो वृक्ष तैयार होता है, वह कर्म है। प्रकारान्तर से कर्मवृक्ष का बीज भाग्य है। इस बीज को प्रारब्ध कहा गया है। तीन प्रकार के बीज होते हैं-
१. वृक्ष से लगा हुआ अपक्व बीज (क्रियमाण कर्म) ।
२. वृक्ष से अलग हुआ सुपक्व बीज जो कि बोने के लिये रखा हुआ है। (सञ्चित कर्म ) ।
३. क्षेत्र में बोया गया बीज जो कि अंकुरित होकर विस्तार प्राप्त कर रहा है। (प्रारब्ध कर्म) ।
इससे स्पष्ट है-कर्म ही भाग्य है। जो कर्म किया जा रहा है, पूरा नहीं हो पाया है, क्रियमाण कर्म है। जो कर्म किया जा चुका है, पर फलीभूत नहीं हो रहा है, सञ्चित कर्म है। यही सञ्चित कर्म जब फल देने लगता है तो प्रारब्ध कर्म कहलाता है। यह दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि यह पूर्वकाल का कृतकर्म है। इसलिये इसे अदृष्ट कहते हैं। इसी का नाम भाग्य वा दैव है। यह कर्म के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। दशम भाव में यह बोया जाता, बढ़ता और फैलता है। वहीं पकता पूर्ण होता है। पूर्ण होकर वही नवम भाव में आकर सचित होता है। कालान्तर में यही परिणामशील होकर देव नाम से जाना जाता है। दशम का कर्म जैसे ही नवम में टपक कर गिरता है, धर्म नाम ग्रहण करता है। अतएव, कर्म = धर्म ।सभी शास्त्र इस मत की पुष्टि करते हैं। इस सत्य को जिसने हृदयंगम कर लिया, वह भाग्यशाली है।
सम्यक् प्रकार से किया हुआ कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता। उसका फल मिलना निश्चित है। अतः संकल्पपूर्वक कर्म करना चाहिये। यही कारण है कि धार्मिक कर्मकाण्डों अनुष्ठानों में संकल्प पढ़ा/कहा जाता है। कर्म अपने कर्ता का पीछा करता है। जब तक कर्ता नहीं मिलता तब तक वह उसे ढूंढ़ता रहता है, भले ही उसे खोजने में युग युगान्तर लग जायें। सैकड़ों जन्मों तक कर्ता का अपने कर्म फल से पिण्ड नहीं छूटता। कहा है-
"यथा धेनुसहस्रेषु वास विन्दति मातरम्। तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥"
(नारायण )
(हजारों गौओं के झुण्ड में जैसे बछड़ा अपनी माता का ठीक-ठीक पता लगा लेता है, उसी तरह पहले का किया कर्म भी अपने कर्ता को ढूंढ लेता है।)
बिना जाने संकल्पहीन वा मोहवश जो कर्म किया जाता है, उसका भी फल होता है और भोगना पड़ता है। वचन है-
"यो हि मोहाद्विपं पीत्वा नावगच्छति दुर्मतिः ।
स तस्य परिणामान्ते जानीते कर्मणः फलम् ॥"
(रामायण )
(जो मतिहत पुरुष अनजाने विष पौकर उससे नहीं अवगत होता, वह उसके परिणाम के अन्त में कर्म के फल को जानता है।)
कर्ता, कर्म और करण के विग्रह को संसार कहते हैं। इसके मूल में क्रिया है। इसी का नाम प्रकृति है। कर्ता १ लग्न है। पाँचों कर्मेन्द्रियाँ कार्य की साधक हैं। इसलिये ये करण हैं।
१. भाव २ बागेन्द्रिय वाणी करण है। इससे स्तुति एवं निन्दा रूप पापनाशक, पुण्यहारक कर्म होते हैं।
२. भाव ३ करेन्द्रिय, दान एवं अपहरण रूप पुण्यवर्धक, पापसंग्रह कमों की करण है।
३. भाव १२ चरणेन्द्रिय, तीर्थयात्रा एवं सन्त दर्शन हेतु चल कर पुण्य करती है तथा खलों को संगति में ले जाकर पापार्जन कराती है।
४. भाव ७ उपस्थेन्द्रिय से रतिदान कर पितृ ऋण से उऋण हुआ जाता है। यह पुण्य है। इसी से बलात्कार एवं शीलभंग करके पाप इकट्ठा किया जाता है।
५. भाव ८ पायु इन्द्रिय से प्रदूषण रूप पाप का फल सद्यः भोगना पड़ता है। लोग अनियत स्थान पर मल त्याग करके जल थल वायु तीनों को दूषित करते हैं। तीर्थो में नदी के किनारे तथा नगरों में रेलवे लाइन के किनारे पाप क्षेत्र बन गये हैं। स्वच्छता सामाजिक पुण्य है। मलायता सामाजिक पाप है।
ये करण कर्म के साधक हैं। कर्म काल के योग से प्रारब्ध बनता है। हर व्यक्ति प्रारब्धवान् है। व्यक्ति के भाग्य से राष्ट्र एवं समाज का भाग्य बनता है। शुभ कर्म से शुभ प्रारब्ध, अशुभ से अशुभ प्रारब्ध बनता है। कर्म ही धर्म है। कर्म की गति बड़ी गहन है। कृष्ण कहते हैं-"गहना कर्मणो गतिः । - गीता ४। १७। इसलिये धर्म अत्यन्त गूढ़ (गहन) है। व्यास का कथन है-'धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्। वनपर्व । इस धर्म को व्याख्या पूर्ण रूप से कौन कर सकता है ? संक्षेप में क्रिया का दृश्य भाग कर्म है तो अदृश्य भाग धर्म में धर्म की शरण में हूँ।
व्यक्ति के धर्म से राष्ट्र का धर्म बनता है। धर्म से पोषित राष्ट्र धर्म की रक्षा करता है। निश्चित एवं स्वाभाविक धर्म के अभाव में राष्ट्र मर जाता है। मृतराष्ट्र में धर्म की दुर्दशा होती रहती है। जिस राष्ट्र मैं धर्म की उपेक्षा/ अवहेलना की जाती है, वह धर्म निरपेक्ष कहलाता है। यह अस्वाभाविक है। राष्ट्र धर्म निरपेक्ष हो ही नहीं सकता। हृदय का धड़कना उसका धर्म है। हृदय का स्पन्दन बन्द होने का अर्थ है कि हृदय ने अपना धर्म त्याग दिया। यह उसकी मृत्यु है। आँख का धर्म है देखना। अन्धी आँखें धर्मनिरपेक्ष हैं। पैरों का धर्म है, चलना। हाथों का धर्म है, कार्य करना। हाथ पैरों में लकवा लग जाय, शक्ति होनता/निष्क्रियता आ जाय तो इसका अर्थ है कि ये धर्म निरपेक्ष हैं। मैथुन करने में अशक्त उपस्थेन्द्रिय धर्मनिरपेक्ष कहलाती है। देह में चेतना का अभाव उसकी धर्मनिरपेक्षता वा शवावस्था है। इस मृत स्थिति का नाम धर्म निरपेक्ष है। दुष्ट एवं देशद्रोही / राष्ट्रभक्षी लोगों के मुंह से धर्म निरपेक्ष शब्द सुनने को मिलता है। भारत के संविधान में यह शब्द नहीं है। इसमें मत निरपेक्ष शब्द का प्रयोग हुआ है। व्यवहार में कोई व्यक्ति मतापेक्ष नहीं हो सकता। प्रत्येक व्यक्ति का कोई न कोई मत होता है। इसी प्रकार राष्ट्र का भी एक निश्चित मत होता है। यही मत उस राष्ट्र का धर्म है। कृत्रिम धर्म परिवर्तनशील एवं समय सापेक्ष होता है, जबकि प्राकृतिक धर्म अपरिवर्तनशील एवं कालनिरपेक्ष होता है। इस धर्म में केवल मनुष्य के कल्याण की ही चर्चा नहीं होती अपितु समस्त प्राणिसमुदाय पशु पक्षी वृक्ष आदि सभी के हित का समवेत विचार होता है। इस धर्म को सत्यधर्म / आर्षधर्म कहते हैं। इस धर्म का घोष है-
"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात् ॥"
(महाभारत)
कितना उदात्त विचार है, यह । यहाँ हिन्दू धर्म है, विश्व धर्म है, शाश्वत धर्म है।
विश्व का धर्म पूर्णता है। जो पूर्ण है, वह विश्व है। जिसमें संशोधन न हो, परिवर्तन न हो, वह पूर्ण है। अतः जो अपरिवर्तनशील एवं नित्य है, वह विश्व है। यह शरीर विश्व है। इसमें एक मस्तक, दो हाथ, दो पैर, एक लिंग, दो आँख, दो कान, दो नासा रन्ध, एक नाभि, एक पेट, एक पायु, एक मुँह अनादिकाल से होता चला आया है। इसमें परिवर्तन का अर्थ है इसके धर्म का लोपन ऐसी दशा में व्यक्ति विकलांग/ अधिकांग होता है। अस्वस्थ, विकल देह को भी धर्मनिरपेक्ष कहेंगे। यह धर्म निरपेक्षता पाप का फल है। जो पापी नहीं है, उसे मेरा प्रणाम !
राष्ट्र का धर्म शासक का धर्म होता है। शासक का धर्म जनता का धर्म होता है। जनता का धर्म भौगोलिक परिवेश का धर्म होता है। इस धर्म का निर्माण पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश से होता है। अतः प्रत्येक देश का धर्म पञ्चतत्वात्मक है। ये तत्व अजर एवं अमर हैं। अतः धर्म भी अजर-अमर हुआ। इस धर्म का आचरण करने वाला धन्य है। ऐसे प्राणी को मेरा प्रणाम ।
संसार में मनुष्यकृत जितने भी धर्म हैं, वे सब अपूर्ण हैं। दुष्टों ने ईश्वर की आड़ में अपना धर्म चलाया है। उनके अहंकारी धर्म के कारण बहुत रक्तपात हुआ है। पानी के बुलबुले के समान ये सभी दुष्ट धर्म नष्टप्राय हैं। इन्हें मानना, अपनाना पाप हैं। जो पापी इन धर्मो के पीछे मरने मारने को उतारू हैं, उन्हें भी नमन करता हूँ। क्योंकि यह सब काल का खेल है। धर्म की गति सूक्ष्म है। उसकी शाखाएँ बहुत है। उसका अन्य नहीं मिलता। वाक्य है-
"सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य बहुशाखा ह्यनन्तिका।" (वनपर्व २०१/२)
जो धर्म पूर्ण है, वह सर्वमान्य है या जो धर्म सर्वमान्य है, वह पूर्ण है। यह प्राकृतिक धर्म है। यह असंशोध्य है। अपूर्ण धर्म सर्वमान्य नहीं होता मानवकृत धर्म अपूर्ण होता है। जिस धर्म में व्यापकता है, यह पूर्ण है। संको धर्म व्यापकताविहीन होता है। यह संकीर्ण बुद्धि का आविष्कार है। देश का संविधान ऐसा हो धर्म होता है। इस संविधान के निर्माता ऋषि नहीं होते। इसलिये इसमें संशोधन होते रहते हैं। भारत का संविधान इस राष्ट्र का धर्म सूत्र है। अब तक इसमें शताधिक संशोधन हो चुके हैं। इस संशोधनशीलता का कोई अंत नहीं इस देश की दुर्दशा का यह एक प्रमुख कारण है। मान लिया हम कोई एक व ५० वर्षों से पहन रहे हैं। इसके तन्तु इतने दृढ़ है कि यह स्वतः फटता वा जीर्ण नहीं होता। किन्तु हम इसे सौ बार से अधिक फाड़ कर सिये वा चकती लगाये हैं। इस फटे सिले वस्त्र को पहन कर हम कैसे गौरवान्वित हो सकते हैं? ऐसा है हमारा भारतीय संविधान । इस विथड़े संविधान पर क्या कोई गर्व कर सकता है ? जैसे फटा वस बदल कर नया धारण किया जाता है, वैसे ही इस जीर्णशीर्ण संविधान को फेंक कर नया संविधान धारण करना इस राष्ट्र के अभ्युदय का सूत्र है।
राष्ट्र का स्वरूप त्रयम्बक है। संसद् संविधान और सेना से राष्ट्र चलता है, जीता है। लग्न संसद् है। तृतीय भाव सेना है। नवम भाव धर्म संविधान है। इन तीनों में एक भी निर्मल वा त्रुटिपूर्ण है तो वह राष्ट्र नाश के कगार पर होता है।
जिस देश की संसद में मूर्ख, उजड्डु और अपराधी लोग पहुँचे, वह कैसे अच्छी होगी ? सैन्य शक्ति में कमी होनी ही नहीं चाहिये। संविधान में योग्यों को उपेक्षा से लाभ होना संभव नहीं। संविधान प्रमुख, सेना प्रमुख एवं संसद् प्रमुख ये तीन व्यक्ति देश राष्ट्र की दशा के उत्तरदायी हैं। इनकी कुण्डली शुद्ध होनी चाहिये। ऐसा व्यक्ति जिसका नवम दशम् भाव निर्बल/ दूषित है, उसे इस पद के अयोग्य समझना चाहिये। धर्म को जड़ से उखाड़ने वालों के लिये ये पद नहीं हैं। हमारे देश के प्रजातान्त्रिक ढांचे के सन्दर्भ में, सेना प्रमुख = सेनाध्यक्ष, संविधान प्रमुख राष्ट्राध्यक्ष तथा संसद् प्रमुख = प्रधानमन्त्री इन तीनों का तत्वदर्शी धार्मिक एवं स्वार्थ निरपेक्ष होना अति आवश्यक है। आगे ऐसा होने जा रहा है, यह हर्ष की बात है।
सब का भाग्य पूर्व निर्धारित है। इसमें तनिक भी वृद्धि-हास सम्भव नहीं। अपने भाग्य पात्र को लिये व्यक्ति जलाशय के किनारे खड़ा है, पात्र को धरितानुसार जल ले रहा है। सद्यः अपने पात्र को छोटा व बड़ा करना सम्भव नहीं है। यह समयसाध्य प्रक्रिया है जो जन्म जन्मान्तर तक होती रहती है। सन्त वचन है...
"जो विधिना ने लिख दिया, छठी रात्रि के अंक ।
राई घटै न तिल बढ़े, रह रे जीव निशंक ॥"
(तुलसीदास )
जब अपना भाग पहले से निश्चित है तो हाय-हाय क्यों किया जाय ? इसमें शंका करना उचित नहीं। अतः निश्शंक होकर अगले जन्म की तैयारी करना चाहिये। मैं आनन्दमय तत्व में प्रविष्ट होकर सबको आनन्द देने के लिये भाग्य पर लेखनी चला रहा हूँ। आनन्दमय ही शान्तिमय ब्रह्म है।
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