आधुनिक भारत की मैलिक वैज्ञानिक परम्परा
आधुनिक भारत की मौलिक वैज्ञानिक परंपरा
इस परंपरा के अंतर्गत उन वैज्ञानिक खोजों को रखा जा सकता है, जो भारत में जन्मे और भारत में ही रहकर, यहीं के संसाधनों से यहीं वैज्ञानिक खोजें कीं और दुनिया के सामने मिसाल कायम की। वैसे तो अंग्रेजों के आने के बाद ज़्यादातर वैज्ञानिक खोज अंग्रेजों के द्वारा ही की गई, किंतु उनके साथ-साथ भारतीय वैज्ञानिकों ने भी अनेक प्रयोग किए और उपलब्धियाँ हासिल कीं। 14 नवम्बर 1941 को केंद्रीय एसेम्बली में पारित प्रस्ताव सी. एस. आई. आर. की स्थापना इस दिशा में पहला कदम था। फिर 26 सितंबर 1942 को सर ए. रामास्वामी मुदालियर और डॉ॰शांतिस्वरूप भटनागर के प्रयासों के फलस्वरूपवैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (कौंसिल ऑफ साइंटिफिक एण्ड इंडस्ट्रियल रिसर्च / सी. एस. आई. आर.) यानीकी स्थापना, नई दिल्ली में एक स्वायत्त संस्था के रूप में हुई। हालाँकि इसकी नींव अंग्रेजों के कार्यकाल में ही पड़ गई थी परंतु काम-काज के सारे नियंत्रण अंग्रेजों के पास होने के कारण विकास कार्य नगण्य ही था। इसलिए हमारा देश लगभग हर वस्तु, सुई, टूथपेस्ट जैसी रोज़मर्रा की आवश्यक वस्तुओं के लिए भी दूसरे देशों पर निर्भर था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभाजन के कारण तो और भी नुकसान पहुँचा। इससे सर्वाधिक क्षति सूत और जूट उद्योग को हुई, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद भारत का वैज्ञानिक विकास देश के प्रथम प्रधनमंत्र पं॰ जवाहरलाल नेहरू के समय में हुआ। उन्होंने देश के वैज्ञानिक विकास के लिए लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण यानी साइंटिफिक टेम्पर जगाने का संकल्प लिया। अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण ही उन्होंने इस कार्य को डॉ॰ शांतिस्वरूप भटनागर को सौंप दिया, जिसे डॉ॰ भटनागर ने सहर्ष स्वीकारा। परिणामस्वरूप उन्हें औद्योगिक अनुसंधान का प्रणेता होने का गौरव प्राप्त हुआ। वैज्ञानिक अनुसंधान और आविष्कारों के लिए दिया जाने वाला देश का सर्वोच्च शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार इन्हीं के नाम पर वैज्ञानिकों को दिया जाता है। देश के समुचित वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास के लिए डॉ॰ भटनागर ने अथक परिश्रम किया और इसके लिए उन्हें पं॰ नेहरू का भरपूर सहयोग मिला जिसके परिणामस्वरूप भारत में राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की कड़ी स्थापित होती चली गई। इस कड़ी की पहली प्रयोगशाला पुणे स्थित राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला थी, जिसका उद्घाटन 3 जनवरी 1950 को पं॰ नेहरू ने किया। इसके बाद दिल्ली में राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला तथा जमशेदपुर में राष्ट्रीय धत्विक प्रयोगशालाकी स्थापना हुई। 10 जनवरी 1953 को नई दिल्ली में सी. एस. आई. आर. मुख्यालय का उद्घाटन हुआ। 1 जनवरी 1955 को जब डॉ॰ भटनागर की मृत्यु हुई थी तब तक देश में विभिन्न स्थानों पर लगभग 15 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की स्थापना हो चुकी थी और ये सभी प्रयोगशालाएँ किसी-न-किसी उद्योग से जुड़ी थीं। इन सभी प्रयोगशालाओं का उद्घाटन और शिलान्यास पं॰ नेहरू द्वारा ही संपन्न हुआ। प्रयोगशालाओं की बढ़ती कड़ी को ‘नेहरू-भटनागर प्रभाव’ कहा गया है।
भारत की तृतीय प्रधनमंत्र श्रीमती इंदिरा गांधी के अथक प्रयासों से आज स्थिति यह है कि भारत विज्ञान के किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है। विकास की इस कड़ी में द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्र के ‘अधिक अन्न उपजाओ’ अभियान ने जहाँ हरित क्रांति के द्वारा खोले, वहीं अन्य क्षेत्रों में भी वैज्ञानिक प्रगति हुई। परिणामस्वरूप आजादी के बाद के इन वर्षों में कृषि, चिकित्सा, परमाणु ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिकी, संचार, अंतरिक्ष, परिवहन और रक्षा विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति के कारण आज भारत देश विकासशील देशों की श्रेणी में अग्रणी है। कृषि से लेकर अंतरिक्ष अनुसंधान तक की कठिन यात्र भारतीय वैज्ञानिकों ने सुविधओं के अभाव में भी कितनी सफलतापूर्वक तय की है इसका प्रमाण हर क्षेत्र में हुई वे अद्भुत खोज और उपलब्धियाँ हैं, जिन्होंने संपूर्ण विश्व के वैज्ञानिक क्षेत्रों में हलचल मचा दी है।
कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य अंग रही है। देश की कुल आबादी के लगभग 70 प्रतिशत व्यक्ति कृषि व्यवसाय से जुड़े हैं। भारतीय कृषि के व्यवसाय में बीसवीं सदी के छठवें दशक को मील का पत्थर कहा जाता है। डॉ॰ बी. पी. पाल, डॉ॰ एस.एम. स्वामीनाथन और डॉ॰ नॉरमन बोरलॉग के प्रयासों से भारत में आई हरित क्रांति के फलस्वरूप हम खाद्यान्न उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान पर हैं। कूरियन ने श्वेत क्रांति द्वारा हमें दुग्ध उत्पादन में भी शीर्ष स्थान पर पहुँचा दिया है, तो पशु-पालन, मछली-पालन, कुक्कुट पालन में हम स्वावलंबी बन चुके हैं। वर्ष 1905 मेंपूसा, बिहार में इम्पीरियल एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना से लेकर वर्तमान 'भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद तक हमने लंबा सफर तय करके कम समय में अधिक उपज देने वाली नई-किस्में और संकर जातियाँ विकसित कर ली हैं। कपास की पहली संकर जाति भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने विकसित की है। कृषि वैज्ञानिकों ने अनुमानित खाद्य आवश्यकता पूर्ति तक पहुँचाने के लिए अनुसंधान कार्य तेज कर दिए हैं।
10 अगस्त 1948 को परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए डॉ॰ होमी जहाँगीर भाभा के प्रयासों से परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन हुआ था। तब से लेकर आज तक हुए विकास के फलस्वरूप हम खनिज अनुसंधान के लिएईंधन निर्माण, व्यर्थ पदार्थों से ऊर्जा उत्पादन, कृषि चिकित्सा उद्योग एवं अनुसंधान में आत्मनिर्भर हो गए हैं। परमाणु ऊर्जा के अंतर्गत नाभिकीय अनुसंधान के क्षेत्र में मुंबई स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की भूमिका सराहनीय है। यहाँ हो रहे नित नए अनुसंधानों के कारण हम पोखरण-2 का सफल परीक्षण कर विश्व की परमाणु शक्ति वाले देशों की पंक्ति में आ खड़े हुए हैं।
विश्व के चौथे सबसे बड़े उद्योग इलेक्ट्रॉनिकी ने समूचे भारत में क्रांति ला दी है। इसके उत्पादन में तेजी लाने के लिए सन् 1970 में भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिकी विभाग की स्थापना की। यह विभाग इलेक्ट्रॉनिकी उद्योग के प्रत्येक क्षेत्र में नीतियाँ तैयार करता है। सूचना प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से कंप्यूटर तथा संचार की दिशा में हो रहे विकास ने दूरसंचार तथा कंप्यूटर उद्योग में क्रांति ला दी है। डिजीटल प्रौद्योगिकी पर आधरित मोबाइल, सेलुलर, रेडियो, पेजिंग, इंटरनेट के आगमन ने सूचना और संचार के क्षेत्र में काफ़ी परिवर्तन ला दिया है। प्रत्यक्ष प्रमाण आज हमारे सामने हैं। इलेक्ट्रॉनिक विभाग का संकल्प इसका लाभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पहुँचाना और प्रत्येक भारतीय के जीवन को बेहतर बनाना है। सी-डेक द्वारा परम सुपर कंप्यूटर का निर्माण हमारी एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
परिवहन के क्षेत्र में हुई व्यापक प्रगति से लगभग सुदूर क्षेत्रों में बसे ग्रामीण क्षेत्रों को सुविध हुई है। यही कारण है कि महीनों में पूरी होने वाली यात्र आज चंद घंटों में पूरी हो जाती है। पर्याप्त अनुसंधान और विकास के फलस्वरूप आज भारत नई तकनीकों और सुविधओं के साथ प्रगति की ओर बढ़ रहा है। रेल, सड़क, जल और वायु परिवहन के क्षेत्र में यद्यपि विकास तेजी से हुआ है, परंतु विश्व की अग्रणी पंक्ति में पहुँचने के लिए इस क्षेत्र में अभी भी बहुत कार्य करने की आवश्यकता है।
आधुनिक भारत की मिश्रित वैज्ञानिक परंपरा तथा उपलब्धियाँ
आधुनिक विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग स्तर पर वैज्ञानिक प्रयोग होते रहे हैं, जिनमें से अधिकांश प्रयोग और अनुसंधान ऐसे हैं, जिन पर एक साथ कई देश काम कर रहे थे। ऐसी दशा में कई खोजें मिश्रित रूप में हुईं और उनका अलग-अलग स्तरों पर विकास हुआ। जैसे कंप्यूटर को ही ले लें। कंप्यूटर की खोज किसी एक वैज्ञानिक अथवा देश ने अकेले नहीं की, बल्कि इस पर एक साथ कई देशों में अलग-अलग स्तरों पर काम चलता रहा और आज कंप्यूटर का जो वर्तमान रूप हैं, वह विभिन्न देशों की मिश्रित वैज्ञानिक उपलब्धियों का विकसित रूप है। कंप्यूटर के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ सराहनीय हैं। आज भारत कंप्यूटर सॉफ्टवेयर बनाने वाले दुनिया के कुछ गिने हुए अग्रणी देशों में से एक है। कंप्यूटर आधुनिक विश्व की एक ऐसी उपलब्धि है, जो समाज के हर क्षेत्र के लिए क्रांति साबित हुआ है चाहे वह कृषि का क्षेत्र हो, उद्योग जगत हो, शिक्षा-जगत हो, वैज्ञानिक अनुसंधानों का काम हो अथवा घरेलू कामकाज। हर जगह कंप्यूटर सहायक सिद्ध हो रहा है। इसकी खोज से हर क्षेत्र में सुविधएँ बढ़ी हैं। पलक झपकते ही तमाम सूचनाएँ दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचने लगी हैं और सूचनाओं के आधर पर नित नए प्रयोगों के नए रास्ते भी खुलने लगे हैं।
इसी तरह चिकित्सा के क्षेत्र में कैट-स्कैनर, रक्षा विज्ञान के क्षेत्र में मिसाइलें, राडार और परमाणु अस्त्र, सूचना जगत में उपग्रहों, परिवहन के क्षेत्र में मोटर कारों व वायुयानों तथा कृषि के क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों और कृषि उपकरणों का विकास भी मिश्रित वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हैं। भारत इन सभी क्षेत्रों में सहभागी है। आज भारत न सिर्फ दूसरे देशों से तकनीक लेकर अद्भुत कार्य कर रहा है बल्कि मौलिक स्तर पर भी अपना योगदान कर रहा है। भारत हर प्रकार से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में वैज्ञानिक विकास में अग्रणी है।
प्रसिद्ध आधुनिक भारतीय वैज्ञानिक और उनकी उपलब्धियाँ
आधुनिक युग में भारत में विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में नए-नए प्रयोग लगातार होते रहे, किंतु कुछ भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों के कारण पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन हुआ। प्रमुख वैज्ञानिकों में जगदीश चंद्र बोस, सी.वी. रमण,होमी जहाँगीर भाभा, शांतिस्वरूप भटनागर, एम. एन. साहा, प्रफुल्लचंद्र राय, हरगोविंद खुराना आदि नाम उल्लेखनीय हैं। जगदीश चंद्र बोस ने उचित साधनों और उपकरणों के अभाव में भी अपना कार्य जारी रखा। उन्होंने लघु रेडियो तरंगों का निर्माण किया। विद्युत चुंबकीय तरंगों के प्रयोग उन्होंने मारकोनी से पहले ही पूरे कर लिए थे। पौधं में जीवन के लक्षणों की खोज उनकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
सी.वी. रमण एक प्रतिभावान वैज्ञानिक थे। उन्होंने प्रकाश किरणों की गुणधर्मिता तथा आकाश और समुद्र के रंगों की व्याख्या पर विशेष शोध किया। अपने शोध के लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार भी मिला। एस. रामानुजम असाधरण प्रतिभावान गणितज्ञ थे। गणितीय सिद्धंतों के क्षेत्र में उनके अनुसंधान के कारण उन्हें बहुत यश और ख्याति मिली। इसी विद्वत-शृंखला में एक प्रसिद्ध वनस्पति और भूभर्ग शास्त्र बीरबल साहनी भी थे।
बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध का शिखर छूने वाले वैज्ञानिकों में एम. एन. साहा, एस.एन. बोस, डी. एन. वीजिया और प्रफुल्लचंद्र राय के नाम उल्लेखनीय हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियाँ
आजादी के बाद जहाँ भारत ने समाज के हर क्षेत्र में तेजी से विकास किया वहीं विज्ञान के क्षेत्र में भी अनेक उपलब्धियाँ हासिल कीं। स्वतंत्र भारत की प्रथम सरकार में विज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों का एक पृथक मंत्रलय बनाया गया। यह मंत्रलय प्रधनमंत्र पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने अधन रखा था। नेहरू जी भारत के बहुमुखी विकास के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सब तरह के साधन और सुविधएँ जुटाईं।
उपलब्ध क्षमता और प्रोत्साहन के कारण 59 वर्षों में ही भारत ने विश्व की वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी की महानतम शक्तियों में तीसरा स्थान प्राप्त कर लिया है। परिणामस्वरूप भारत कच्चे माल के निर्यात से अब विश्व की सर्वाधिक मजबूत औद्योगिक अर्थव्यवस्था में से एक बन गया है।
भारत ने विज्ञान के अन्य विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है। खगोल विज्ञान में प्राचीन अधययनों के आधर पर ही भारत के वैज्ञानिक अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यों में लगे हैं। आज भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिक अपने बलबूते पर उपग्रह बनाकर और अपने ही शक्तिशाली राकेटों से उन्हें अंतरिक्ष में स्थापित करने में समर्थ हैं। पूर्णतः स्वदेश में निर्मित ध्रवीय प्रक्षेपण यान पी.एस.एल.वी.सी. 2 ने 26 मई 1999 को 11 बजकर 52 मिनट पर श्रीहरिकोटा से एक सफल उड़ान भरी और एक भारतीय उपग्रह तथा दो विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में निर्धरित कक्षा में स्थापित कर दिया। अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भारत काफ़ी आगे पहुँच चुका है। इसके साथ ही भारत के दूर संवेदी नेटवर्क में 634 ग्रह शामिल हो गए हैं। हमारा यह दूर संवेदी नेटवर्क संसार का सबसे बड़ा दूरसंवेदी नेटवर्क है। अंतरिक्ष कार्यक्रमों का विकास संचार माधयमों तथा रक्षा मामले संबंध सफलताओं में काफ़ी सहायक सिद्ध हुआ है। आज भारत विभिन्न दूरियों तक मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र बनाने में समर्थ है। प्रतिरक्षा के क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय सफलताएँ मिली हैं।
भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी आश्चर्यजनक प्रगति की है। परमाणु ऊर्जा का मुख्यतः उपयोग कृषि और चिकित्सा जैसे शांतिपूर्ण कार्यों के लिए किया जा रहा है। परमाणु और अंतरिक्ष से जुड़ा विषय इलैक्ट्रॉनिकी है। भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति की है। परम 10000 सुपर कंप्यूटर बनाकर हम इस क्षेत्र में अग्रणी देशों की पंक्ति में आ गए हैं। हम अब सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित उपकरणों का निर्यात विकसित देशों को भी कर रहे हैं। भारत के सूचना प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षित इंजीनियरों की अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान जैसे विकसित देशों में भारी माँग है।
वैज्ञानिक अनुसंधानों के बलबूते पर भारत ने जलयान निर्माण, रेलवे उपकरण, मोटर उद्योग, कपड़ा उद्योग आदि में आशातीत सफलता प्राप्त की है। आज हम भारत की उद्योगशालाओं में बनी अनेक वस्तुओं का निर्यात करते हैं।
बाहरी कड़ियाँ
प्रियंका चौहान (2012). वैदिक वाड्मय में विज्ञान और प्रौद्योगिकी. बरेली: प्रकाश बुक डिपो.
इस परंपरा के अंतर्गत उन वैज्ञानिक खोजों को रखा जा सकता है, जो भारत में जन्मे और भारत में ही रहकर, यहीं के संसाधनों से यहीं वैज्ञानिक खोजें कीं और दुनिया के सामने मिसाल कायम की। वैसे तो अंग्रेजों के आने के बाद ज़्यादातर वैज्ञानिक खोज अंग्रेजों के द्वारा ही की गई, किंतु उनके साथ-साथ भारतीय वैज्ञानिकों ने भी अनेक प्रयोग किए और उपलब्धियाँ हासिल कीं। 14 नवम्बर 1941 को केंद्रीय एसेम्बली में पारित प्रस्ताव सी. एस. आई. आर. की स्थापना इस दिशा में पहला कदम था। फिर 26 सितंबर 1942 को सर ए. रामास्वामी मुदालियर और डॉ॰शांतिस्वरूप भटनागर के प्रयासों के फलस्वरूपवैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (कौंसिल ऑफ साइंटिफिक एण्ड इंडस्ट्रियल रिसर्च / सी. एस. आई. आर.) यानीकी स्थापना, नई दिल्ली में एक स्वायत्त संस्था के रूप में हुई। हालाँकि इसकी नींव अंग्रेजों के कार्यकाल में ही पड़ गई थी परंतु काम-काज के सारे नियंत्रण अंग्रेजों के पास होने के कारण विकास कार्य नगण्य ही था। इसलिए हमारा देश लगभग हर वस्तु, सुई, टूथपेस्ट जैसी रोज़मर्रा की आवश्यक वस्तुओं के लिए भी दूसरे देशों पर निर्भर था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभाजन के कारण तो और भी नुकसान पहुँचा। इससे सर्वाधिक क्षति सूत और जूट उद्योग को हुई, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद भारत का वैज्ञानिक विकास देश के प्रथम प्रधनमंत्र पं॰ जवाहरलाल नेहरू के समय में हुआ। उन्होंने देश के वैज्ञानिक विकास के लिए लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण यानी साइंटिफिक टेम्पर जगाने का संकल्प लिया। अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण ही उन्होंने इस कार्य को डॉ॰ शांतिस्वरूप भटनागर को सौंप दिया, जिसे डॉ॰ भटनागर ने सहर्ष स्वीकारा। परिणामस्वरूप उन्हें औद्योगिक अनुसंधान का प्रणेता होने का गौरव प्राप्त हुआ। वैज्ञानिक अनुसंधान और आविष्कारों के लिए दिया जाने वाला देश का सर्वोच्च शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार इन्हीं के नाम पर वैज्ञानिकों को दिया जाता है। देश के समुचित वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास के लिए डॉ॰ भटनागर ने अथक परिश्रम किया और इसके लिए उन्हें पं॰ नेहरू का भरपूर सहयोग मिला जिसके परिणामस्वरूप भारत में राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की कड़ी स्थापित होती चली गई। इस कड़ी की पहली प्रयोगशाला पुणे स्थित राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला थी, जिसका उद्घाटन 3 जनवरी 1950 को पं॰ नेहरू ने किया। इसके बाद दिल्ली में राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला तथा जमशेदपुर में राष्ट्रीय धत्विक प्रयोगशालाकी स्थापना हुई। 10 जनवरी 1953 को नई दिल्ली में सी. एस. आई. आर. मुख्यालय का उद्घाटन हुआ। 1 जनवरी 1955 को जब डॉ॰ भटनागर की मृत्यु हुई थी तब तक देश में विभिन्न स्थानों पर लगभग 15 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की स्थापना हो चुकी थी और ये सभी प्रयोगशालाएँ किसी-न-किसी उद्योग से जुड़ी थीं। इन सभी प्रयोगशालाओं का उद्घाटन और शिलान्यास पं॰ नेहरू द्वारा ही संपन्न हुआ। प्रयोगशालाओं की बढ़ती कड़ी को ‘नेहरू-भटनागर प्रभाव’ कहा गया है।
भारत की तृतीय प्रधनमंत्र श्रीमती इंदिरा गांधी के अथक प्रयासों से आज स्थिति यह है कि भारत विज्ञान के किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है। विकास की इस कड़ी में द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्र के ‘अधिक अन्न उपजाओ’ अभियान ने जहाँ हरित क्रांति के द्वारा खोले, वहीं अन्य क्षेत्रों में भी वैज्ञानिक प्रगति हुई। परिणामस्वरूप आजादी के बाद के इन वर्षों में कृषि, चिकित्सा, परमाणु ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिकी, संचार, अंतरिक्ष, परिवहन और रक्षा विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति के कारण आज भारत देश विकासशील देशों की श्रेणी में अग्रणी है। कृषि से लेकर अंतरिक्ष अनुसंधान तक की कठिन यात्र भारतीय वैज्ञानिकों ने सुविधओं के अभाव में भी कितनी सफलतापूर्वक तय की है इसका प्रमाण हर क्षेत्र में हुई वे अद्भुत खोज और उपलब्धियाँ हैं, जिन्होंने संपूर्ण विश्व के वैज्ञानिक क्षेत्रों में हलचल मचा दी है।
कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य अंग रही है। देश की कुल आबादी के लगभग 70 प्रतिशत व्यक्ति कृषि व्यवसाय से जुड़े हैं। भारतीय कृषि के व्यवसाय में बीसवीं सदी के छठवें दशक को मील का पत्थर कहा जाता है। डॉ॰ बी. पी. पाल, डॉ॰ एस.एम. स्वामीनाथन और डॉ॰ नॉरमन बोरलॉग के प्रयासों से भारत में आई हरित क्रांति के फलस्वरूप हम खाद्यान्न उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान पर हैं। कूरियन ने श्वेत क्रांति द्वारा हमें दुग्ध उत्पादन में भी शीर्ष स्थान पर पहुँचा दिया है, तो पशु-पालन, मछली-पालन, कुक्कुट पालन में हम स्वावलंबी बन चुके हैं। वर्ष 1905 मेंपूसा, बिहार में इम्पीरियल एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना से लेकर वर्तमान 'भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद तक हमने लंबा सफर तय करके कम समय में अधिक उपज देने वाली नई-किस्में और संकर जातियाँ विकसित कर ली हैं। कपास की पहली संकर जाति भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने विकसित की है। कृषि वैज्ञानिकों ने अनुमानित खाद्य आवश्यकता पूर्ति तक पहुँचाने के लिए अनुसंधान कार्य तेज कर दिए हैं।
10 अगस्त 1948 को परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए डॉ॰ होमी जहाँगीर भाभा के प्रयासों से परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन हुआ था। तब से लेकर आज तक हुए विकास के फलस्वरूप हम खनिज अनुसंधान के लिएईंधन निर्माण, व्यर्थ पदार्थों से ऊर्जा उत्पादन, कृषि चिकित्सा उद्योग एवं अनुसंधान में आत्मनिर्भर हो गए हैं। परमाणु ऊर्जा के अंतर्गत नाभिकीय अनुसंधान के क्षेत्र में मुंबई स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की भूमिका सराहनीय है। यहाँ हो रहे नित नए अनुसंधानों के कारण हम पोखरण-2 का सफल परीक्षण कर विश्व की परमाणु शक्ति वाले देशों की पंक्ति में आ खड़े हुए हैं।
विश्व के चौथे सबसे बड़े उद्योग इलेक्ट्रॉनिकी ने समूचे भारत में क्रांति ला दी है। इसके उत्पादन में तेजी लाने के लिए सन् 1970 में भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिकी विभाग की स्थापना की। यह विभाग इलेक्ट्रॉनिकी उद्योग के प्रत्येक क्षेत्र में नीतियाँ तैयार करता है। सूचना प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से कंप्यूटर तथा संचार की दिशा में हो रहे विकास ने दूरसंचार तथा कंप्यूटर उद्योग में क्रांति ला दी है। डिजीटल प्रौद्योगिकी पर आधरित मोबाइल, सेलुलर, रेडियो, पेजिंग, इंटरनेट के आगमन ने सूचना और संचार के क्षेत्र में काफ़ी परिवर्तन ला दिया है। प्रत्यक्ष प्रमाण आज हमारे सामने हैं। इलेक्ट्रॉनिक विभाग का संकल्प इसका लाभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पहुँचाना और प्रत्येक भारतीय के जीवन को बेहतर बनाना है। सी-डेक द्वारा परम सुपर कंप्यूटर का निर्माण हमारी एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
परिवहन के क्षेत्र में हुई व्यापक प्रगति से लगभग सुदूर क्षेत्रों में बसे ग्रामीण क्षेत्रों को सुविध हुई है। यही कारण है कि महीनों में पूरी होने वाली यात्र आज चंद घंटों में पूरी हो जाती है। पर्याप्त अनुसंधान और विकास के फलस्वरूप आज भारत नई तकनीकों और सुविधओं के साथ प्रगति की ओर बढ़ रहा है। रेल, सड़क, जल और वायु परिवहन के क्षेत्र में यद्यपि विकास तेजी से हुआ है, परंतु विश्व की अग्रणी पंक्ति में पहुँचने के लिए इस क्षेत्र में अभी भी बहुत कार्य करने की आवश्यकता है।
आधुनिक भारत की मिश्रित वैज्ञानिक परंपरा तथा उपलब्धियाँ
आधुनिक विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग स्तर पर वैज्ञानिक प्रयोग होते रहे हैं, जिनमें से अधिकांश प्रयोग और अनुसंधान ऐसे हैं, जिन पर एक साथ कई देश काम कर रहे थे। ऐसी दशा में कई खोजें मिश्रित रूप में हुईं और उनका अलग-अलग स्तरों पर विकास हुआ। जैसे कंप्यूटर को ही ले लें। कंप्यूटर की खोज किसी एक वैज्ञानिक अथवा देश ने अकेले नहीं की, बल्कि इस पर एक साथ कई देशों में अलग-अलग स्तरों पर काम चलता रहा और आज कंप्यूटर का जो वर्तमान रूप हैं, वह विभिन्न देशों की मिश्रित वैज्ञानिक उपलब्धियों का विकसित रूप है। कंप्यूटर के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ सराहनीय हैं। आज भारत कंप्यूटर सॉफ्टवेयर बनाने वाले दुनिया के कुछ गिने हुए अग्रणी देशों में से एक है। कंप्यूटर आधुनिक विश्व की एक ऐसी उपलब्धि है, जो समाज के हर क्षेत्र के लिए क्रांति साबित हुआ है चाहे वह कृषि का क्षेत्र हो, उद्योग जगत हो, शिक्षा-जगत हो, वैज्ञानिक अनुसंधानों का काम हो अथवा घरेलू कामकाज। हर जगह कंप्यूटर सहायक सिद्ध हो रहा है। इसकी खोज से हर क्षेत्र में सुविधएँ बढ़ी हैं। पलक झपकते ही तमाम सूचनाएँ दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचने लगी हैं और सूचनाओं के आधर पर नित नए प्रयोगों के नए रास्ते भी खुलने लगे हैं।
इसी तरह चिकित्सा के क्षेत्र में कैट-स्कैनर, रक्षा विज्ञान के क्षेत्र में मिसाइलें, राडार और परमाणु अस्त्र, सूचना जगत में उपग्रहों, परिवहन के क्षेत्र में मोटर कारों व वायुयानों तथा कृषि के क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों और कृषि उपकरणों का विकास भी मिश्रित वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हैं। भारत इन सभी क्षेत्रों में सहभागी है। आज भारत न सिर्फ दूसरे देशों से तकनीक लेकर अद्भुत कार्य कर रहा है बल्कि मौलिक स्तर पर भी अपना योगदान कर रहा है। भारत हर प्रकार से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में वैज्ञानिक विकास में अग्रणी है।
प्रसिद्ध आधुनिक भारतीय वैज्ञानिक और उनकी उपलब्धियाँ
आधुनिक युग में भारत में विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में नए-नए प्रयोग लगातार होते रहे, किंतु कुछ भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों के कारण पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन हुआ। प्रमुख वैज्ञानिकों में जगदीश चंद्र बोस, सी.वी. रमण,होमी जहाँगीर भाभा, शांतिस्वरूप भटनागर, एम. एन. साहा, प्रफुल्लचंद्र राय, हरगोविंद खुराना आदि नाम उल्लेखनीय हैं। जगदीश चंद्र बोस ने उचित साधनों और उपकरणों के अभाव में भी अपना कार्य जारी रखा। उन्होंने लघु रेडियो तरंगों का निर्माण किया। विद्युत चुंबकीय तरंगों के प्रयोग उन्होंने मारकोनी से पहले ही पूरे कर लिए थे। पौधं में जीवन के लक्षणों की खोज उनकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
सी.वी. रमण एक प्रतिभावान वैज्ञानिक थे। उन्होंने प्रकाश किरणों की गुणधर्मिता तथा आकाश और समुद्र के रंगों की व्याख्या पर विशेष शोध किया। अपने शोध के लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार भी मिला। एस. रामानुजम असाधरण प्रतिभावान गणितज्ञ थे। गणितीय सिद्धंतों के क्षेत्र में उनके अनुसंधान के कारण उन्हें बहुत यश और ख्याति मिली। इसी विद्वत-शृंखला में एक प्रसिद्ध वनस्पति और भूभर्ग शास्त्र बीरबल साहनी भी थे।
बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध का शिखर छूने वाले वैज्ञानिकों में एम. एन. साहा, एस.एन. बोस, डी. एन. वीजिया और प्रफुल्लचंद्र राय के नाम उल्लेखनीय हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियाँ
आजादी के बाद जहाँ भारत ने समाज के हर क्षेत्र में तेजी से विकास किया वहीं विज्ञान के क्षेत्र में भी अनेक उपलब्धियाँ हासिल कीं। स्वतंत्र भारत की प्रथम सरकार में विज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों का एक पृथक मंत्रलय बनाया गया। यह मंत्रलय प्रधनमंत्र पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने अधन रखा था। नेहरू जी भारत के बहुमुखी विकास के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सब तरह के साधन और सुविधएँ जुटाईं।
उपलब्ध क्षमता और प्रोत्साहन के कारण 59 वर्षों में ही भारत ने विश्व की वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी की महानतम शक्तियों में तीसरा स्थान प्राप्त कर लिया है। परिणामस्वरूप भारत कच्चे माल के निर्यात से अब विश्व की सर्वाधिक मजबूत औद्योगिक अर्थव्यवस्था में से एक बन गया है।
भारत ने विज्ञान के अन्य विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है। खगोल विज्ञान में प्राचीन अधययनों के आधर पर ही भारत के वैज्ञानिक अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यों में लगे हैं। आज भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिक अपने बलबूते पर उपग्रह बनाकर और अपने ही शक्तिशाली राकेटों से उन्हें अंतरिक्ष में स्थापित करने में समर्थ हैं। पूर्णतः स्वदेश में निर्मित ध्रवीय प्रक्षेपण यान पी.एस.एल.वी.सी. 2 ने 26 मई 1999 को 11 बजकर 52 मिनट पर श्रीहरिकोटा से एक सफल उड़ान भरी और एक भारतीय उपग्रह तथा दो विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में निर्धरित कक्षा में स्थापित कर दिया। अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भारत काफ़ी आगे पहुँच चुका है। इसके साथ ही भारत के दूर संवेदी नेटवर्क में 634 ग्रह शामिल हो गए हैं। हमारा यह दूर संवेदी नेटवर्क संसार का सबसे बड़ा दूरसंवेदी नेटवर्क है। अंतरिक्ष कार्यक्रमों का विकास संचार माधयमों तथा रक्षा मामले संबंध सफलताओं में काफ़ी सहायक सिद्ध हुआ है। आज भारत विभिन्न दूरियों तक मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र बनाने में समर्थ है। प्रतिरक्षा के क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय सफलताएँ मिली हैं।
भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी आश्चर्यजनक प्रगति की है। परमाणु ऊर्जा का मुख्यतः उपयोग कृषि और चिकित्सा जैसे शांतिपूर्ण कार्यों के लिए किया जा रहा है। परमाणु और अंतरिक्ष से जुड़ा विषय इलैक्ट्रॉनिकी है। भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति की है। परम 10000 सुपर कंप्यूटर बनाकर हम इस क्षेत्र में अग्रणी देशों की पंक्ति में आ गए हैं। हम अब सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित उपकरणों का निर्यात विकसित देशों को भी कर रहे हैं। भारत के सूचना प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षित इंजीनियरों की अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान जैसे विकसित देशों में भारी माँग है।
वैज्ञानिक अनुसंधानों के बलबूते पर भारत ने जलयान निर्माण, रेलवे उपकरण, मोटर उद्योग, कपड़ा उद्योग आदि में आशातीत सफलता प्राप्त की है। आज हम भारत की उद्योगशालाओं में बनी अनेक वस्तुओं का निर्यात करते हैं।
बाहरी कड़ियाँ
प्रियंका चौहान (2012). वैदिक वाड्मय में विज्ञान और प्रौद्योगिकी. बरेली: प्रकाश बुक डिपो.
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