विष्णु सहस्रनाम में, बल परमात्मा

विष्णु सहस्रनाम में, बल परमात्मा का नाम है। इसलिये बल के विषय में कुछ भी कहना परमात्मा के विषय में कहने के समान कठिन है। भगवान् स्वयं कहते हैं...
 "बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।"
(गीता ७। ११ )

कामासक्ति से रहित बलवानों का बल मैं हूँ। ग्रहों में जो बल है, उसमें न काम (इच्छा) है, न राग (आसक्ति) है। इसलिये मह साक्षात् ब्रह्म रूप हैं। यह निरपेक्ष बल से सम्पन्न होकर जातक को उसके शुभाशुभ कर्मों का फल देते रहते हैं। चाहे कोई भी यह हो, यदि वह बलवान है तो तत्सम्बन्धी फलों को प्रदान करेगा। यदि वह बली नहीं है तो फल प्रदान करने में असमर्थ होगा। इस प्रकार, बलवान् ग्रह शुभ है तथा बलहीन ग्रह अशुभ है। महाभारत में व्यास जी कहते हैं...

 "सर्व बलवतां पथ्यं सर्वं बलवतां शुचिः ।"
 ( शान्तिपर्व १३४।८)

 "सर्वं बलवता धर्मः सर्वं बलवता स्वकम्।"
(आश्वमेधिकपर्व ३० । २४)

ज्योतिष शास्त्र में बल के मापने की इकाई रूप है।【 १ रूप = ६०°】

♂१. जो ग्रह सूर्य से १८०° दूर है, उसे १ रूप बल मिलता है। ऐसा चन्द्र, मंगल बृहस्पति शनि के साथ है. बुध एवं शुक्र के साथ नहीं। बुध अधिक से अधिक १ राशि आगे या पीछे रहता है। शुक्र अधिक से अधिक २ राशि आगे या पीछे रहता है। इसलिये ये यह अस्त न हों, पूर्ण प्रकाशमान हो तथा सूर्य से १८° दूरी पर कम से कम हों तो इन्हें १ रूप बल मिलता है। पूर्णरूप से अस्तग्रह (सूर्य के राशि अंश कला पर स्थित शून्य बल पाता है। बीच की स्थिति से उनके बल का आनुपातिक निश्चयन करना चाहिये।

 ♂२. शुभग्रह (चन्द्रमा बुध बृहस्पति शुक्र) जिन्हें देखते हैं, उन्हें उनको दृष्टि के अनुसार १ रूप, ३/४रूप,१/२ रूप,१/४ रूप बल मिलता है। ये ही यह जिससे युति / समागम करते हैं, उन्हें १ रूप बल प्राप्त होता है। केतु को रूप, रू शुभग्रहों की श्रेणी में मूर्धन्य स्थान प्राप्त है। पाप ग्रह (सूर्य मंगल शनि) जिन्हें देखते हैं, उन्हें उनकी दृष्टि के अनुसार १ रूप३/४ रूप,१/२,१/४ रूप बल छिनता है। राहु को पाप ग्रहों की पंक्ति में गिना जाता है।

♂३. बुध, गुरु, लग्न में १ रूप तथा सप्तम में शून्य बल पाते हैं। चन्द्र, शुक्र चतुर्थ में १ रूप तथा दशम में शून्य बल पाते हैं। शनि को सप्तम में १ रूप तथा लग्न में शून्य बल मिलता है। सूर्य, मंगल को दशम में १ रूप तथा चतुर्थ में शून्य बल मिलता है। बीच के भावों में स्थित होने पर अनुपात से बल का आकलन करना चाहिये।

♂४. (क) जिस ऋतु में जन्म होता है, उसके स्वामी ग्रह को १/२ रूप बल मिलता है। जिस वार में जन्म होता है, उस वार के स्वामी यह को ३/४रूप बल मिलता है

 जिस ग्रह की होरा में जन्म हो उसका स्वामी ग्रह १ रूप बल प्राप्त करता है। कुल २४ होरा होते हैं।

 ♂(ख) कृष्ण पक्ष में पाप यह सूर्य, मंगल, शनि को १ रूप बल मिलता है, विशेष कर अमावस्या को शुभ ग्रह शून्य बल पाते हैं। शुक्ल पक्ष में, विशेषकर पूर्णिमा को शुभ ग्रहों- बुध, चन्द्र, शुक्र, गुरु को १ रूप बल मिलता है। पाप ग्रह शून्य बल पाते हैं। 

♂(ग) दक्षिण अयन में परमा क्रांति पर चन्द्र, शनि को १ रूप बल मिलता है। सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र को शून्य बल मिलता है। उत्तर अयन में परमा क्रांति पर सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र को १ रूप बल मिलता है। चन्द्र शनि को शून्य। बुध को दोनों अपनों में १/२ रूप बल मिलता है। दोनों अपनों के बीच में सब ग्रहों को रूप यल मिलता है।

 ♂(घ) ब्राह्ममुहूर्त में गुरु को १ रूप बल मिलता है। प्रातः बुध को १ रूप बल मिलता है। पूर्वान्ह से अपरान्ह पर्यन्त सूर्य को १ रूप बल मिलता है। सायं शुक्र को १ रूप बल मिलता है। राज्यारंभ में चन्द्रमा को १ रूप बल मिलता है। गहननिशा में मंगल और शनि १ रूप बल प्राप्त करते हैं।
 
 सूर्य की परम उत्तर क्रांति हो तथा दोपहर का समय हो तो उसे २ रूप बल मिलता है। 

चन्द्रमा पूर्णिमा का हो तथा परमा दक्षिण क्रांति में रात का जन्म हो तो चन्द्रमा २ रूप बल पाता है।

♂ ५. (क) उच्च राशिस्थ ग्रह को ३/४ रूप, मूल त्रिकोणस्थ को १/२ रूप, स्वराशिस्थ को - १/४ रूप तथा मित्रराशि में स्थित ग्रह को रूप बल मिलता है।

♂(ख) उच्चनवांशस्थ ग्रह को १ रूप, वर्गोत्तम को३/४ रूप बल, स्वनवांशस्थ ग्रह को - /२ रूप तथा मित्रनवांश में स्थित यह को १/४ रूप बल मिलता है। 

♂ (ग) चन्द्रमा और शुक्र समराशियों में १ रूप बल पाते हैं। सूर्य, मंगल, बृहस्पति विषम राशियों में १/२ रूप बल पाते हैं। शनि, बुध सम वा विषम दोनों में रूप बल पाते हैं। 

♂(घ) केन्द्र स्थान में १ रूप, उपकेन्द्र में ३/४ रूप तथा अपकेन्द्र में १/२ रूप बल मिलता है।

♂६. सभी ग्रह दिव्य बल सम्पन्न होते हैं। दिव्य बलवत्ता के सन्दर्भ में इनका ..

【क्रम>> सूर्य >चन्द्र> बुध > शुक्र > मंगल > वृहस्पति> शनिश्चर है।】

【♀ राहु-केतु अमितबल सम्पन्न हैं। ♀】

यहाँ का दिव्य बल यह है सूर्य १/२ रूप।

 चन्द्रमा =६/७ रूप। 

बुध=५/७ रूप। 

शुक्र=४/७ रूप।

 मंगल =३/७ रूप। 

बृहस्पति =३/७ रूप।

 शनिश्चर = १/७ रूप 
लग्नेश = १ रूप ।

 बली मह तत्संबंधी पूर्ण फल देते हैं। सभी बलों का योग करने पर छः रूप वाला ग्रह बली माना जाता है।

ग्रहों का बल निकालना कठिन है। उससे भी कठिन ग्रहों का फल कहना है। जो सत्यनिष्ठ है, वही फल कहने में समर्थ है। सत्यनिष्ठा तप से मिलती है। कलियुग में तप दुष्कर है। ऋषियों से ज्ञान की परम्परा चली आ रही है। इस परम्परा के प्रकाश में मैंने ग्रहों के वर्णन में आर्य वचनों का आश्रय लिया। जातक की कुण्डली में जो होता है, वही उसकी हथेली में होता है। ऐसा मेरा अनुभव है। किन्तु हथेली की अपेक्षा कुण्डली से फल कहना सरल है। हथेली में सभी ग्रह स्थिर हैं तथा सबके हाथ में समान रूप से एक जैसे स्थान पर होते हैं। कुण्डली में ऐसा नहीं है। भिन्न-भिन्न लोगों की कुण्डलियों में इनकी स्थिति भिन्न-भिन्न होती है।

कुण्डली को देखकर कैसे बल निकाला जाय, यह मैंने बताया। हाथ को देखकर ग्रह का बल जानना कठिन नहीं है, किन्तु इसे कहना कठिन है। ग्रहों के योगायोग के सम्बन्ध में गोस्वामी तुलसी दास का एक दोहा है...

 'ग्रह भेषज जल पवन पट, पाइ कुयोग सुयोग।
 होहिं कुवस्तु सुवस्तु जग, लखहि सुलच्छन लोग ॥"
 ( बालकाण्ड, रा.च.मा. )

ग्रह, औषधि, जल, वायु, वस्त्र- ये कुयोग और सुयोग द्वारा अशुभ एवं शुभ फल की प्राप्ति कराते हैं। इस तथ्य को लक्षणशास्त्र के ज्ञाताजन अच्छी तरह जानते हैं। ऐसे ज्ञानवानों का मैं सेवक हूँ।

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