ved mantra or astrology with औषधि
वेद मंत्र है... "सोमेनादित्या बलिन् सोमेन पृथिवी मही। अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः ।।"(अथर्व काण्ड १४, अनुवाक १, सूक्त १, मंत्र २ ) [सोमेन आदित्या बलिनः सोमेन पृथिवी मही अथो (अथ) नक्षशणाम् एषाम् उपस्थे सोमः आहितः ॥] जो व्यष्टि में है, वही समष्टि में है। जो समष्टि में है, वही व्यष्टि में है। लोक में जो सत्य है, वही वेद में है। वेद में जो कहा गया है, वही लोक में दिखाई पड़ता है। इस मंत्र का अर्थ करने पर यही तथ्य प्रकट होता है। सामान्य पुरुष एवं सामान्य स्त्री में जो संबंध है, वही विराट पुरुष एवं विराट् प्रकृति में है।विराट् पुरुष = ब्रह्म विराट् प्रकृति = माया। ब्रह्म = आदित्य । आदित्य = आङ् (समन्तात् समन्तम् समन्ततः विश्वव्यापी पूर्ण) + दिन्व् परस्मै. दिव्ति प्रीणनार्थे प्रसन्न होना करना, आनन्दित करना / होना । जो पूर्ण आनन्द देता है तथा पूर्ण आनन्दमय है, वह आदित्य है। 'आनन्दं ब्रह्म।' यह उपनिषद् वाक्य है। सोम= सू अदादि सूते, दिवादि सूयते तुदादि सुचति उत्पन्न करना जन्म देना, उत्तेजित/ प्रेरित करना, सुखानन्द देना + मन् प्रत्यय । सोम = आनन्द, अमृत, चन्द्रमा, आहलाद, प्रकाश, कर्पूर, जल, वायु, कुबेर, धन, ऐश्वर्य, शिव, मुख्य, प्रमुख, यम । सोम = वीर्य । रेतः सोमः ।( कौषीतक ब्रह्मण १३ /७ ),(तैत्तिरीय ब्रह्मण २।७ । ४ । १),( शतपथ ब्रह्मण ३ । ३ । २।१) सोम= सोमन् । इसे अंग्रेजी में भ्रष्टोच्चारण पूर्वक सीमन् / सेमन कहते हैं। इसकी वर्तनी है SEMEN अंग्रेजी में इसका अर्थ वीर्य होता है।सोम = आनन्ददाता। जिससे सुख मिले वह सोम है। शरीर में वीर्य के बाहुल्य से सुख मिलता। है, शरीर निरोग रहता है। वौर्य जब स्खलित होकर बाहर निकलता है तो जाते या गिरते समय सुख देता है। जिसकी योनि में चूता/जाता/गिरता है, उसे सुख देता है। गर्भाशय में पंच कर रज से मिल कर पिण्ड का रूप लेने पर भात्री को सुख देता है। इस प्रकार वीर्य हर प्रकार से सुखदाता है, आनन्दवदर्धक है, सृष्टिकारक है। सोम शुक्र है।"सौम्यम् शुक्रमार्तवमाग्न्येयम् । शुक्रं च्युतं योनिमभिप्रपद्यते संसृज्यते चार्तन । ततोऽग्निसोमसंयोगात् संसृज्यमानो गर्भाशयमनु प्रतिपद्यते क्षेत्र।" (सुश्रुत, शरीरस्थान अ. ३ ।)चन्द्रमा जल प्रकाश वायु धन देवता यम सुख देने के कारण सोम कहते हैं। सोम= सुम्न= सुख, (निघंटु ३।६। )आदित्य के अर्थ पर पुनः विचार करता हूँ। अदितिः वाङ्नाम (निघंटु १ । ११) अ + दो अवखण्डने अदितिः । तया जातः आदित्यः । आदित्यः अविभक्तः पूर्णः वा। जो सम्पूर्ण है, वह आदित्य है।आदित्यः = जारः - (निरुक्त ३ । ३ । १६ ।) जरति अर्चतिकर्मा जरिता स्तोता जारः (निघंदु ३ । १४. १६।) ज् वृद्धौ जरति जारः । जो वीर्यवृद्ध है, सोमवृद्ध है, रेतवृद्ध है-वह जार है। जिसमें अतिशय वीर्य है। वह जार है। जो जार है, वह आदित्य है। वीर्याधिक्य से आदित्य भासमान होता है।आदते आदित्यः । ऐसा भी समझना चाहिये। जो प्रकृति को लेता है, प्राप्त करता है, ग्रहण करता है, वह आदित्य है। जो विश्व का ज्ञान प्रतिपल प्राप्त करता है, रखता है, वह आदित्य है। आदित्य सर्वव्यापी है। आदित्य वीर्य का भण्डार होता है, कोष होता है, निधि होता है, उत्स होता है, स्रोत होता है, सागर होता है। अतः आदित्य वीर्यवान् है, बलवान् है। आदित्य बली है।मंत्र में 'सोमेन आदित्याः बलिनः आया है। बालन शब्द पुंलिंग का प्रथमा विभक्ति बहुवचन है-बलिनः । आदित्य शब्द पुंलिंग का प्रथमा विभक्ति बहुवचन है- आदित्याः । आदित्य एक है, अनेक हैं-१२ द्वादश हैं। १२ ज्योतिर्लिंगों को १२ आदित्य कहते हैं। सोम शब्द पुंलिंग का तृतीय एकवचन है-सोमेन एक ही सोम १२ लिंगों में समाया हुआ है। सोम सेही लिंग वीर्यवान् बलवान् होता है। इसलिये 'सोमेनादित्या बलिनः' का प्रयोग मंत्र में हुआ है। मंत्र में आया है- "सोमेन पृथिवी मही।"पृथिवी = प्रथ् + पिवन् संप्रसारणम् । प्रथ् विस्तारे, प्रख्याने च भ्वादि आत्मने. प्रथते, चुरादि. उभय प्रथयति-ते । [यद्] अप्रथयमत्तत् पृथिव्यै पृथिवीत्वम्' । (तै. ब्रह्म. १ । १ । ३७ । )तामप्रथयत् सा पृथिव्यभवत् । (शतपथ ब्रह्म. ६ । १ । १ । १५ ।)अतः पृथिवी = जननी/त्रिगुणात्मक मूला प्रकृति क्यों कि यह विस्तृत है, सर्वत्र है, व्यापक है। आदित्य परमात्मा का शरीर पृथिवी कहलाता है। क्यों कि वह व्यापक है और यह प्रकृति है। वेद कहता है... "सूर्यो मे चक्षुर्वातः प्राणोन्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम् ।" ( अथर्व ५ । ९ । ७ ।) "सूर्याच्चक्षुरन्तरिक्षाच्छ्रोत्रं पृथिव्याः शरीरम् ।" (अथर्व ५ । १० । ८।)इस वर्णन से स्पष्ट है जो कुछ भी पश्चभूतात्मक चराचर रूपाकार है, उसे पृथिवी नाम दिया। पृथिवी भूमि है। भवन्ति उत्पद्यन्ते अपत्यानि यस्याम् स भूमिः । पुनः द्यावा पृथिवीनाम ।(निघंटु ३ । ३० ।) जो कुछ भी है वह पृथिवी है। इसी का नाम प्रकृति है। यह महान् है। कपिल कहते हैं ...'सत्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः प्रकृतेर्महान् ।' (सौ.सू. १।६१।)मही = मह पूजायाम् + अच् + ङीप् । पूज्य इसका अर्थ है। मह् धातु भ्वा. पर महति, चुरा. उभय महयति ते पूजार्थक है। इसलिये मही = पूज्य । पुनः माया आत्मने. महते विकसित होना, बढ़ना अर्थ वाली है। इसलिये मही= पृथ्वी। लोक में पृथिवी को पूज्य माना जाता है। पृथिवी जननी है, माता है। इसलिये भी पूज्य मंत्र की दूसरी पंक्ति है-'अथो नक्षत्राणाम् एषाम् उपस्थे सोमः आहितः ।'अथो = अथ / प्रारंभ में। एषाम् = नक्षत्रराशियों के। नक्षत्राणाम्= नक्षत्रों के / अक्षतवीयों के वीर्य बूंदों के / स्खलित वीर्य पुज्जों के। नक्षत्र= न+क्षत् +र।[न=अ]अ + क्षत्= अक्षत वीर्य राशि से युक्त वीर्य प्राचुर्य से युक्त । षष्ठी बहुवचन नपुसंक लिंग। उपस्थे = उपस्थेन्द्रिय में । सप्तमी एक वचन। उप+स्था+क। सोमः =आनन्दः । आहितः = आ + धा + क्त स्थापित, जमा किया गया।यहाँ उपस्थ बह्नर्थक है। पुरुष जननेन्द्रिय उपस्थ है। इसमें से वीर्य निकल कर बाहर आता है। स्त्री जननेन्द्रिय भी उपस्थ है। इसमें वीर्य प्रवेश करता है। ये दोनों वीर्यवान् वीर्यवती हैं। समीप वा निकट की स्थिति भी उपस्थ है। गोद को कहते हैं, उपस्थ पेट वा शरीर का मध्य भाग नाभि को भी उपस्थ कहते हैं।विराट पुरुष / ब्रह्म का वीर्य नक्षत्र है विराट् प्रकृति की नाभि योनि भी उपस्थ है। अनन्त आकाश महामाया प्रकृति की योनि / भग/ गर्भाशय है। पर ब्रह्म परमात्मा का वीर्य ही नक्षत्र राशि है। सोम आनन्द है। ब्रह्म आनन्दस्वरूप है। 'सच्चिदानन्द ब्रह्म' उपनिषद् वचन है। ब्रह्म आनन्द के लिये आनन्द में आकर स्वयं आनन्द पाने और प्रकृति को आनन्द देने के लिये अपना वीर्य नक्षत्रों के रूप में स्खलित करता है, बोता है, त्रिपुर सुन्दरी महामाया के गर्भ में आहित करता है, स्थापित करता है। ब्रह्म का रेतस् सोम नाम से ख्यात है। इस सोम की अपरिमित असंख्य बूँदें नक्षत्रों राशियों के रूप में दीख रही है।जीव, ब्रह्म का अनुकरण करता है। निर्गुण ब्रह्म का सगुण प्रकृति के सान्निध्य से सर्जन क्रिया का समारंभ होता है। ठीक ऐसा ही पुरुष का स्त्री से संयोग होने पर होता है। नक्षत्र नक्षति व्याप्तिकर्मा । (निघण्टु २ । १८ ।) नक्षत्रराशि व्यापक है। नक्षत्र समूह बाहर हैं, भीतर हैं, सर्वत्र है। राशियाँ अग्निषोमीय हैं। अग्निसोमात्मकंविश्वम् । पुरुष प्रकृति की सायुज्यता एकात्मकता अद्वैतता अनन्यता ही अर्धनारीश्वर है। अर्धनारीश्वर = अर्थ + नारि + ईश्वर = ऋ गतौ (अर्) + न + अरि + ईश् वर (वृ + अप्) इस प्रकार ; अर्थ = गतिशील। नारि = गतिहीन । ईश्वर = स्वामी एवं श्रेष्ठ वा सर्वव्यापी। जो एक ही साथ चल भी हो अचल भी हो, एक दूसरे का स्वामी हो, विभु वा अणु रूप में व्यापक हो वह अर्धनारीश्वर है। द्यावापृथिवी पुरुषप्रकृति = ब्रह्म माया शिवशक्ति= रामजानकी =अर्धनारीश्वर । सम्पूर्ण राशियाँ दो भागो में विभक्त हैं- अग्नि तत्व एवं सोमतत्व ६ राशियाँ सोमात्मक हैं । ६ राशियाँ आग्न्येय हैं।इस राशि चक्र को देखने से स्पष्ट है कि सोम तत्व के अगल बगल वा दायें बायें अग्नि तत्व है। तथा अग्नि तत्व के आगे पीछे वा दोनों ओर सोम तत्व है। इसका तात्पर्य हुआ-सोम के चारों ओर अग्नि है, अग्नि के चतुर्दिक सोम है। सोम तत्व पुरुष के लिंग में होता है। अग्नि तत्व स्त्री की योनि में होता है। दोनों एक दूसरे को घेरे हैं। लोक में भी यही देखने को मिलता है। मैथुन क्रिया में, पुरुष का लिंग स्त्री की योनि से चतुर्दिक घिरा होता है तथा स्त्री की योनि भीतर से पुरुष के लिंग से घिरी रहती है। सोम से आनन्द है। अग्नि से आनन्द है। जब पुरुष का शिश्न स्त्री के भग में आगे पीछे गति करता है तो घर्षण होता है। घर्षण से अग्नि (उष्मा) उत्पन्न होती है। बिना अग्नि के आनन्द नहीं। इस घर्षण से सोम का प्राकट्य होता है। बिना सोम के आनन्द नहीं। अतः सोम और अग्नि दोनों का अर्थ आनन्द है। इस आनन्द को पाने के लिये सारा संसार पागल हो रहा है। भोगी और योगी दोनों का इष्ट यही आनन्द है। अग्नि में सोम की आहुति देने से यह आनन्द मिलता है। सोम में अग्नि की आहुति लेने से भी यह आनन्द मिलता है। इसका मुझे अनुभव है।【चित्र मे सभी विवरण संलग्न है...】ऊपर के चक्र से स्पष्ट है-हर राशि अपने से विपरीत तत्व वाली राशि से आवृत है। यह रास है। जो राशि है वही रास है। कृष्ण ने रास लीला किया। कृष्ण सोम तत्व है। कृष्ण चन्द्र कहा जाता है। गोपी अग्नि तत्व है। यह गोप्य वा गोपनशील है। रास लीला में कृष्ण के दोनों ओर गोपी तथा गोपी के दोनों ओर कृष्ण हैं। जितनी गोपियां उतने कृष्ण जितने कृष्ण उतनी गोपियाँ १२ राशियों में ६ राशियों कृष्ण हैं तथा ६ राशियाँ गोपी हैं। मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ (१, ३, ५, ७, ९, ११) कृष्ण वा सोमात्मक हैं। वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन (२, ४, ६, ८, १०, १२) गोपी वा आग्न्येय हैं। अग्नि-सोम, माया ब्रह्म सीता राम, गोपी-कृष्ण, गौरी शंकर, प्रकृति-पुरुष, स्त्री-पुंस् भगशिश्न का योग ही विश्वचक्र है। ये दोनों एक दूसरे के अधिकरण हैं। वेद बारम्बार यही कहता है। जो इसे जानता है, वह ऋषि है।आकाशस्थ नक्षत्रों का स्वरूप अग्निमय है। अग्नि के अतिरिक्त ये कुछ भी नहीं हैं। ये प्रकाश के मूर्तिमान रूप हैं, दग्धमान ज्वाला हैं, रूप तन्मात्र के विग्रह हैं। ये अवाङ्मनसगोचर हैं। वेद के अनुसार ये अग्नि हैं, दूत हैं, होतु है, विश्ववेदस है तथा सुतु हैं। एक मंत्र है... अग्नि दूतं वृणीमहे, होतारं विश्ववेदसम्, अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् । (ऋग्वेद, मण्डल १, अध्याय ४, सूक्त १२, मंत्र १ ।),( अथर्ववेद, काण्ड २०, सूक्त १०१, मंत्र १ । )अग्नि = अग् भ्वादि पर. अगति + नी ध्वादि उभ. नयति-ते । = अग्नी = अग्नि। कुटिल गतियों के नियामक को अग्नि कहते हैं। यह सर्वनियन्ता वा परमेश्वर का पर्याय है। पदार्थों की सूक्ष्मातिसूक्ष्म से द्रुतातिद्रुत पर्यन्त समस्त गति उसके अधीन होने से वह अग्नि नाम से जाना जाता है। दूत = दूङ् परितापे, दिवादि आत्मने दूयते + क्त प्रत्यय। जो जलाता है, कष्ट देता है, कालरूप हो कर सबको पीडित करता है, वह दूत है। यह अग्नि का पर्यायवाची है। अग्नि की दाहकता से पदार्थों का नाश होता है, प्राणि समुदाय तपता है। इसलिये अग्नि दूत है। दूत का अर्थ है- जलानेवाला, शोकप्रद, क्षयकर। होतारम् = होतृ शब्द पुंलिंग द्वितीया एकवचन, आहुति (पदार्थ/भोजन) देने वाला। हु जुहो.पर, जुहोति + तृच्=होतृ।आदरपूर्वक देना अर्थ में। बिना पुरुषार्थ के भी हमें सम्मान पूर्वक जीविका प्राप्त होती है। इसे देने वाला अग्नि है। होतारम् = दातारम् । विश्ववेदसम् = विश्ववेदस् शब्द पुंलिंग द्वितीया एक वचन। विश्व =सम्पूर्ण वेदस्= जानने वाला, ज्ञाता। अग्नि सब कुछ जानता है। सर्वव्यापी होने से वह विश्ववेदस् है। भूत भवत् एवं भविष्य का ज्ञान उसे संतत रहता है। उसकी उपासना करने वाला त्रिकालज्ञ हो जाता है। सुक्रतुम् = सु श्रेष्ठार्थक उपसर्ग + क्रतु शब्द पुंलिंग द्वितीय एकवचन इसका अर्थ हुआ श्रेष्ठ कर्ता परमेश्वर ही एकमात्र श्रेष्ठ कर्ता है। श्रेष्ठ कर्ता होने के लिये उसकी उपासना की जाती हैं। अस्य = इस संसार के / जीवन संग्राम के। यज्ञस्य = लेन-देन के समस्त व्यवहारों का। वृणीमहे= वृ(भ्वादि ,स्वादि, क्रयादि उभ.) वरति ते, वृणोति-वृणुते, वृणाति-वृणीते का अर्थ चुनना, पसन्द करना, याचना करना प्रार्थना करना है। वृणीमहे = वृण्महे / वृणमहे स्वादि लट् आत्मने। हम चाहते हैं, वरण करते हैं, अपने लिये स्वीकार करते हैं।अग्नि का यह मंत्र चतुर्व्यूहात्मक है। दूतं होतारं विश्ववेदसं मुक्रतुये चार अग्नि के विशेषण है। इस मन्त्र का अन्वय यह है- अस्य यज्ञस्य अग्नि दूतं (च) होतारं (च) विश्ववेदसं (च) सुक्रतुं (च) वृणीमहे। इन चार विशेषणें में से किसी एक वा दो वा तीन वा चारों की प्राप्ति इस मन्त्र के जापक को होती है। वेद मंत्र "अग्नि दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ॥" में प्रयुक्त दूत शब्द की विशिष्ट व्याख्या का प्रसाद नत मस्तक हो कर श्री पं. जी के सामने रख रहा हूँ। रामायण में श्री हनुमान जी को रामदूत कहा गया है। इस प्रसंग से स्पष्ट है-दूत के तीन कार्य हैं। प्रथम, समाचार पहुँचाना। द्वितीय, सूचना ले आना। तृतीय, नगर वा पुर को जलाना हृदय को जलाना / युद्ध का उद्घाटन करना / नाश की विभीषिका रचना। केवल समाचार वार्ता को ले जाना पहुँचाना अथवा ले आना, प्राप्त करना दूता का कर्म नहीं है। इसके साथ-साथ जब तक वह विनाश की विभीषिका नहीं रचता, तब तक दूत कहलाने का अधिकारी नहीं है। दूत में दू (ङ) परितापे का जो बीज है, यहाँ ध्वंस की ज्वाला उगलता है। हनुमान ने, दूत होने के कारण यही किया। अशोक वाटिका का नाश किया। लंका नगरी को जलाया। राम का संदेश सीता को दिया। सीता का संदेश राम तक पहुँचाया। इन तीन कामों को करने से हनुमान जी राम के दूत कहलाये। श्री राम ने दूसरी बार अंगद को दूत बना कर रावण के पास भेजा। अंगद ने रावण को राम की वार्ता सुनाई, सब के सम्मुख रावण को खरी खोटी सुना कर उसका हृदय जलाया / चित्त को दुःखाया / युद्ध का आह्वान किया तथा उस का समाचार ले कर राम तक पहुँचाया। यह त्रेता युग की बात है। श्री कृष्ण भी दूत बने थे। युधिष्ठिर का दूत बन कर दुर्योधन के पास गये थे। उन्होंने भी तीन काम किया। प्रथम, युधिष्ठिर को समझौता वार्ता से दुर्योधन को अवगत कराया। द्वितीय, अपने व्यवहार से दुर्योधन को उत्तापित किया तथा युद्ध के वातावरण का निर्माण किया। तृतीय, वहाँ की सारी बातों से युधिष्ठिर को अवगत कराया। श्री कृष्ण के दूत बनने से कौरवों का सर्वनाश हुआ। इसी लिये गान्धारी ने कृष्ण को शाप दिया कि कृष्ण ! इसी तरह तुम्हारे यदुवंश का भी नाश होगा। कृष्ण चाहते तो युद्ध न होने देते। किन्तु दूत में दू (ङ) परितापे का जो बीज है, वह उन्हें वैसा न करने दिया। आधुनिक युग में राजदूत होते हैं। ये भी वही काम करते हैं- सूचना देना, सूचना लेना तथा विस्फोटक कार्यों में लीन रहना दूत शब्द में अग्नि तत्व है। ऐसा होना अनिवार्य है। इस प्रकार, दूत का अर्थ केवल संदेश वाहक संवाददाता ही नहीं अपितु, ध्वंसक उपद्रवकारक भी है। ऐसे अग्नि देव, जो दूत नाम से ख्यात हैं, मेरे अहंकार को दग्ध करें । राशिपुञ्ज अग्नि ही हैं। राशियाँ तीन हैं- चर, अचर, द्विस्वभाव अग्नि भी तीन हैं- वषटकार, स्वधाकार, स्वाहाकार ये तीन अग्नियाँ हो १२ अग्नियाँ हैं। व्यास जी कहते हैं ...'ज्योतिष्टोमविभागौ च वषट्काराश्रयौ पुनः। द्वावानी सम्प्रयुध्येते महात्मानी महाद्युती " -(हरिवंशे )वषट्कार अग्नि दो प्रकार की है- १. ज्योतिष्टोम (ज्योतियुक्त), २. विभाग [वि = विशेष, भा = चमक, ग = गतिमती] स्वधाकार अग्नियाँ पाँच हैं ...'पिठरः पतगः स्वर्ण श्वागाधो भ्राज एव च। स्वधाकाराश्रयाः पञ्च आयुध्यंस्तेऽपि चाग्नयः ।।' (- हरिवंशे )१. पिठर २. पतग ३. स्वर्ण ४. श्वागाध ५. भ्राज में पाँच अग्नियाँ स्वधाकार नाम से जानी जाती हैं। स्वाहाकार अग्नियाँ भी पांच हैं- १. कल्माष २. कुसुम ३ दहन ४. शोषण ५ तपन । 'ते जावेदसः सर्वे कल्माष कुसुमस्तथा, दहन: शोषणश्चैव तपनश्च महाबलः । स्वाहाकारस्य विषये प्रख्याखतः पंचमग्नयः ॥ " (हरिवंशे)१२ राशियाँ और कुछ नहीं, यही १२ अग्नियों है।राशियाँ अग्निमय हैं। अग्नि के ये द्वादश गुण इन राशियों में हैं। अग्नि व्यापक ब्रह्म है। राशियाँ भी व्यापक हैं। अग्नि वा राशि के रूप में एक ब्रह्म सब के द्वारा पूजा जाता है। ब्रह्मणे नमः । #कालचिन्तन #नवग्रहोंमें #नक्षत्रविद् 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